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हाँ इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी
देखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारी

तेरी पिचकारी की तक़दीद में ऐ गुल हर सुबह
साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी

जिस पे हो रंग फिशाँ उसको बना देती है
सर से ले पाँव तलक रश्के चमन पिचकारी

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में
अभी आ बैठें यहीं बनकर हम तंग पिचकारी

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का 'नज़ीर'
पहुँचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी- नजीर अकबराबादी

मायने

गुंचादहन =कली जैसे सुन्दर और चोटे मुँह वाली, रंगबिरंग= रंग फेंकने वाली रंग बिरंगी, तक़दीद =स्वागत में, फिशाँ=रंग छिड़का हुआ, रश्के चमन = बगीचे की ईर्ष्या की पात्र, तंग= समान, पिचकारी के समान,आशिके शैदा = आशिक होनेवाले का, मुग्ध आशिक का

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