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अख्तर शीरानी को मोहब्बत का शायर कहा जाता है या यु कहे वो मोहब्बत के सबसे बड़े शायर थे क्योंकि नारी को और उसके कारण प्रेम और रोमांस को अपना काव्य-विषय बनाने वाले आधुनिक उर्दू-शायर आंतरिक अनुभूतियों के साथ-साथ बाह्य प्रेरणाओं को भी अपने सम्मुख रखते हैं| सामाजिक प्रतिबन्धों से घबराकर संसार से निकल भागने या कोई और संसार बसाने की इच्छा करने की अपेक्षा वे सामाजिक प्रतिबन्धों को तोड़ने और इसी संसार को स्वर्ग-समान बनाने पर उतारू हैं, और साथ ही अंधे कामदेव को भी आंखें प्रदान कर रहे हैं|

अख्तर शीरानी का असल नाम मोहम्मद दाऊद ख़ां था 4 मई, 1905 ई. को टौंक (राजस्थान) में आपका जन्म हुआ| आपके पिता हाफ़िज महमूद खां शीरानी जाने-माने शिक्षाविद थे|

आपने टौंक में ही उर्दू की प्रारंभिक पुस्तकें अपनी चची से पढ़ीं और फिर मौलवी अहमद ज़मां और मौलवी साबिर अली ‘शाकिर’ से फ़ारसी का कुछ ज्ञान प्राप्त किया। ‘अख़्तर’ के कथनानुसार ‘शाकिर’ साहब के शिष्यत्व-काल से ही उसमें काव्य-अभिरुची पैदा हो गई थी। लेकिन 1914 ई. में जब ‘अख़्तर’ के पिता हाफ़िज महमूद खां शीरानी इंगलैंड से वापस आये तो उन्होंने शायरी की बजाय उसे पहलवानी सिखानी शुरू कर दी और इस उद्देश्य के लिए विशेष रूप से एक पहलावन नौकर रख दिया, जो सुबह शाम ‘अख़्तर’ की मालिश करके और लंगर-लंगोट कसके उसे अखाड़े में उतरने के लिए ललकारता।
पहलवानी का यह सिलसिला 1920 ई. तक चला। 1920 ई. में जब ‘अख़्तर’ के पिता ओरियंटल कालेज लाहौर में फ़ारसी के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए तो ‘अख़्तर’ भी उनके साथ लाहौर चला गया। आपने १९२१ में इस्लामिया कालेज, लाहौर में पढाना प्रारंभ किया बाद में वे ओरिएंटल कालेज, लाहौर में चले गए| अख्तर बहुत कम उम्र में टौंक से लाहौर आ गए थे और जिंदगी भर यही रहे|

अब पहलवानी के स्थान पर ‘अख़्तर’ के पिता ने उसकी शिक्षा-दीक्षा पर अधिक जोर देना शुरू किया, लेकिन लाहौर की साहित्यिक बैठकों और काव्य की स्वाभाविक अभिरुचि ने ‘अख़्तर’ को १९२१ में मुंशी फाजिल (उर्दू भाषा में डिग्री) और १९२२ में अदीब फ़ाज़िल (फारसी भाषा में डिग्री) से आगे नहीं बढ़ने दिया, और अपनी उस छोटी-सी आयु में ही ‘अख़्तर’ को अपनी नज़्मों पर इतनी प्रशंसा मिली कि भविष्य का यह महान मोहब्बत का शायर घर वालों के कड़े विरोध के बावजूद शिक्षा से विमुख हो शायरी के मैदान में कूद पड़ा।
शायरी के अतिरिक्त, उस ज़माने में कुछ समय तक उसने उर्दू की प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘हुमायूँ’ के सम्पादन का काम किया। फिर 1925 में ‘इन्तिख़ाब’ का सम्पादन किया। 1928 में रिसाला ‘ख़यालिस्तान’ निकाला और 1931  में ‘रोमान’ जारी किया और उसके बाद कुछ समय तक स्वर्गीय मौलाना ताजवर नजीबाबादी की मासिक पत्रिका ‘शाहकार’ का सम्पादन रहा। आपके ज्ञात ग़ज़ल संग्रह में अख्तरिस्तान, सुबह-ए-बहार, शहनाज़ है|

स्वर्गीय मौलाना ताजवर नजीबाबादी  के बारे में कहा जाता था कि आपको अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने का बहुत शौक़ था और ‘अख़्तर’ को अपनी शराबनोशी के लिए पैसों की सख़्त ज़रूरत थी। ‘अख़्तर’ के एक मित्र ने मौलाना से सिफ़ारिश की कि ‘अख़्तर’ को अपनी पत्रिका का सम्पादन-कार्य सौंप दें। मौलाना इस शर्त पर राज़ी हो गए कि यदि ‘अख़्तर’ अपने आपको उनका शिष्य घोषित कर दे तो वे बड़ी खुशी से उसे ‘शाहकार’ का सम्पादक बना देंगे।
‘अख़्तर’ से जब इस बारे में कहा गया तो उसने पूछा :
‘‘तनख़्वाह क्या होगी ?’’
‘‘दो सौ रुपये,’’ उत्तर मिला।
‘‘कुछ पेशगी देंगे ?’’
मौलाना ने तुरन्त सौ रुपये गिन दिये। नोट थामकर ‘अख़्तर’ ने अपने मित्र से कहा, ‘‘तमाम अख़बारों में मेरी तरफ़ से ऐलान छपवा दो कि आज से मैं मौलाना का शागिर्द हूं।’’ और यह कहकर शराबख़ाने की राह पकड़ी। (कुछ लोगों का कहना है कि इस बात में कुछ अधिक सच्चाई नहीं है। उनका कहना है कि शुरू-शुरू में ‘अख़्तर’ ने मौलाना से बक़ायदा अपने शे’रों पर संशोधन लिया था)।

1935 ई. में ‘अख़्तर’ को हैदराबाद दक्कन की एक साहित्यिक संस्था ‘दारुल-तर्जुमा’ ने अपने यहां पर एक उच्च पद पर बुलाना चाहा, लेकिन वे दिन ‘अख़्तर’ की ख्याति और बेतहाशा शराबनोशी के दिन थे। प्रत्यक्ष है कि वह यह पद कैसे स्वीकार करता ? इसी प्रकार जब ‘अख़्तर’ के पिता इस्लामिया कालेज लाहौर की प्रोफ़ैसरी छोड़कर ओरियंटल कालेज लाहौर में चले गये और ‘अख़्तर’ को इस्लामिया कालेज में अपने पिता की आसामी पेश की गई तो उसने यह कहकर इन्कार कर दिया कि लड़कों को पढ़ाना मेरे बस का रोग नहीं। निःसंदेह उन दिनों कोई बात भी उसके बस का रोग न थी। फ़्लेमिंग रोड लाहौर के एक मकान में बाहर की सीढ़ियों से मिला हुआ एक छोटा-सा कमरा था और ‘अख़्तर’ था। लाहौर के शराबख़ाने थे और ‘अख़्तर’ था। या भटकने को गलियां थीं और ‘अख़्तर’ था। फिर शराब-नोशी भी आम शराबियों जैसी न थी। एक बार पीने बैठता तो बस पिये चला जाता। यह सिलसिला निरंतर पन्द्रह-बीस दिन तक चलता और आश्चर्य की बात यह थी कि इन बीस दिनों में खाने की कोई चीज़ उसके गले से न उतरती थी। इसके बाद किसी तरह दो-चार दिन की नाग़ा होती और वह दौर फिर से शुरू हो जाता। लाहौर में आवारागर्दी और शराबनोशी का यह सिलसिला 1943 ई. तक चला। उसके बाद उसके पिता उसे वापस टौंक ले गये। 1943 ई. से 1947 ई. तक टौंक में उसने ऐसी गुमनामी की ज़िन्दगी गुजारी कि मित्रों को उसके पिता को पत्र लिखकर पूछना पड़ा कि ‘अख़्तर’ को कुछ हो तो नहीं गया ?
वहां टौंक में तो ‘अख़्तर’ को कुछ नहीं हुआ, हां देश के विभाजन के बाद जब वह पुनः लाहौर पहुँचा तो उसकी विचित्र दशा थी। सुर्ख और श्वेत चेहरा कालिख खा गया था। बड़ी-बड़ी काली आँखें भीतर को धंस गई थीं और पीली पड़ गई थीं। मांस ने हड्डियां छोड़ दी थीं। हाथों में कम्पन था; लेकिन कपकपाते हाथों में शराब की बोतल भी थी, जिसे वह ‘दुख़्तरे-गर्दन-दराज़ (लम्बी गर्दन वाली की बेटी) कहा करता था।  9 सितम्बर 1948 ई. को उर्दू के इस महान रोमांसवादी शायर ने बड़ी दयनीय दशा लाहौर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया।
उसकी मृत्यु के बाद, उसके परम मित्र नय्यर वास्ती का कहना है कि जब एक टूटी-फूटी संदूकची को (जो ‘अख़्तर’ की एकमात्र सम्पत्ति थी) खोला गया तो उसमें से चंद मुसव्विदों (पाण्डुलिपियों) और हसीनों के चंद ख़ुतूत (पत्रों) के सिवा कुछ न निकला। मानो ‘ग़ालिब’ ने अपने लिए नहीं ‘अख़्तर’ शीरानी के लिए यह शे’र कहा था :
"चंद-तस्वीरे-बुता, चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला"
अख्तर ने अपनी शायरी में अपनी माशुका या यु कहे अपनी प्रेयसी को जगह दी और बकायदा जगह ही न दी शायरी में उसका नाम भी लिया जिसमे सलमा, रेहाना और अज़रा शामिल है|

ज़रा गौर फरमाइए:
तेरी सूरत सरासर पैकरे-महताब* है सलमा,  *=चाँद का प्रतिरूप
तेरा जिस्म इक हुजूमे-रेशमो-कमख़्वाब* है सलमा   *=रेशम और कमख़्वाब का ढेर

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