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आपने पिछली कई कड़ियों में ज़िया फतेहाबादी की गज़ले पढ़ी है आज उनके सुपूत्र रविन्दर सोनी जी की एक ग़ज़ल पेश कर रहा हू आशा है आप सभी को पसंद आएगी |

सुकूँ से आशना अब तक दिल ए इनसाँ नहीं है
कहूँ क्यूँ कर कि अहसास ए ग़म ए दौराँ नहीं है

भरोसा अपने दस्त ओ पा पे है मुझ को अज़ल से
वो मुश्किल कौन सी है मेरी जो आसाँ नहीं है

रबाब-ए-गुल से नग़में फूट निकले है मगर अब
परस्तार-ए-रिहाई-क़ैदी-ए-ज़िन्दां नहीं है

ख़याल ए साहिल ए मक़सूद है दिल में अभी तो
मिरी कश्ती सुपुर्द-ए-मौज-ए-तूफाँ नहीं है

हूँ उस से दूर तो भी है वफ़ा का पास दिल में
उसे मैं भूल जाऊँ ये मिरा ईमाँ नहीं है

कहाँ तक आँख से आँसू बहाऊँ मैं लहू के
कहो इक बार फिर इस दर्द का दरमाँ नहीं है

रवि इस ज़िंदगी में हो मुझे भी चैन हासिल
सिवा इस के मिरे दिल में कोई अरमाँ नहीं है- रविन्दर सोनी रवि

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