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उस बज्म में मुझसे नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किये

दिल ही तो है सियासते-दरबाँ से डर गया
मै और जाऊ डर से तेरे बिन सदा किये

बेसर्फा ही गुजरती है हो गरचे उम्र-खिज्र
हजरत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किये

मकदूर हो तो ख़ाक से पूछो कि ए लईम
तू ने वो गंजहा-ए-गिरामाय क्या किये

सोहबत में गैर की न पड़ी हो कही ये खू
देने लगा है बोसे बगैर इल्तिजा किये

'ग़ालिब' तुम्ही कहो कि मिलेगा जवाब क्या
माना कि तुम कहा किये और वो सुना किये

मायने

सियासते-दरबाँ=दरबान की चालो से, उम्र-खिज्र=एक दीर्घ आयु, पैगम्बर ( खिज्र) जितनी आयु, लईम=कंजूस, गंजहा-ए-गिरामाय=महान आत्माए, खू=आदत

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