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नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात जहा बात बनाये न बने

मै बुलाता तो हू उसको मगर ए जज्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी की बिन आये न बने

खेल समझा है, कही छोड़ न दे, भूल न जाये
काश यु भी हो कि बिन मेरे सताए न बने

गैर फिरता है लिए यु तेरे खत को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने

इस नजाकत का बुरा हो वो भले है तो क्या
हाथ आये तो उन्हें हाथ लगाये न बने

कह सके कौन कि ये जलवागरी किसकी है
पर्दा छोड़ा है वो उसने कि उठाये न बने

मौत कि राह न देखू कि बिन आये न रहे
तुमको चाहू कि न आओ तो बुलाए न बने

बोझ वो सर से गिरा है कि उठाये न बने
काम वो आन पड़ा है कि बनाये न बने

इश्क पर जौर नहीं ये वो आतश ग़ालिब
कि लगाये ना लगे और बुझाये न बने

मायने
नुकताची=मीन-मेख निकालने वाला, जलवागरी=पदर्शन, आतश=आग

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  1. " रोज कहता हूँ न जाऊँगा कभी घर उसके
    रोज उस कूचे में इक काम निकल आता है । "


    २७ दिसंबर १७९७ को जन्मे मिर्ज़ा ग़ालिब का आज जन्मदिन है - चाचा ग़ालिब को हमारा आदाब ...

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