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आईना क्यों न दू की तमाशा कहे जिसे
ऐसा कहा से लाऊ की तुझ सा कहे जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बज्मे-ख्याल में
गुलदस्ता-ए-निगाह, सुवैदा कहे जिसे

फूंका है किसने गोशे-मुहब्बत में ए खुदा
अफ्सुने-इंतजार तमन्ना कहे जिसे

सर पर हुजूमे-दर्दे-गरीबी से डालिए
वो एक मुश्ते-ख़ाक कि सहरा कहे जिसे

है चश्मेतर में हसरते-दीदार से निहां
शौके-इनां गुसेख्ता दरिया कहे जिसे

दरकार है शिगुफ्तने-गुल हाए ऐश को
सुब्हे बहार, पंबा-ए-मीना कहे जिसे

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है की सब अच्छा कहे जिसे

मायने
बज्मे-ख्याल=कल्पना गोष्ठी, गुलदस्ता-ए-निगाह=पुष्प गुच्छ की नज़र, सुवैदा =ह्रदय पर धब्बा, गोशे-मुहब्बत=प्रेम के कान, अफ्सुने-इंतजार=प्रतीक्षा का जादू, हुजूमे-दर्दे-गरीबी=गरीबी कि पीड़ा, मुश्ते-ख़ाक=मुट्ठी भर मिट्टी, चश्मेतर=भीगी आँख, हसरते-दीदार=दर्शनाभिलाषी, निहां=गुप्त, शौके-इनां=रुचिकर लगाम, गुसेख्ता=विक्षिप्त, दरकार=आवश्यकता, शिगुफ्तने-गुल=पुष्प हर्ष, पंबा-ए-मीना=कपास कि सुराही

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  1. वाह ... वाह ... क्या बात है ...
    आपका बहुत बहुत आभार ... इन नज्मो को हम सब के साथ साँझा करने के लिए !

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