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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता
कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता

खुलुसे-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती
शऊरे-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता

तुझे अब क्या कहे ऐ मेहरबा अपना ही रोना है
कि सारी जिंदगी ईसार भी करते नहीं बनता

भंवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए
तवाफे-मौजे-कमरफ़्तार भी करते नहीं बनता

इसी दिल को भरी दुनिया के झगडे झेलने ठहरे
यही दिल जिसको दुनियादार भी करते नहीं बनता

जलती है दिलो को सर्द-महरी भी ज़माने कि
सवाले-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता

'खिंजा' उनकी तवज्जो ऐसी मुमकिन नहीं लेकिन
ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता-  महबूब खिंजा

मायने

खुलुसे-नाज़ = अभिमान की निश्चलता, शऊरे-हुस्न=सौंदर्य का विवेक, बेदार=चोकन्ना, ईसार=स्वार्थ/त्याग, तवाफे-मौजे-कमरफ़्तार=मध्दम गति की लहर की परिक्रमा, सर्द-महरी=कठोरता, सवाले-गर्मी-ए-बाज़ार=सवालो से बाज़ार गर्म करना, इसरार=आग्रह

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