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जेहन-ए-आदमियत पर मस्लेहत के पहरे है
लोग जितने मुख्लिस है, जख्म उतने गहरे है

फुल है यहाँ कांटे, जिस्म है यहाँ पत्थर
किस जहा के वासी है, किस नगर में ठहरे है

जिंदगी का दरवाजा खटखटा के देखा है
इस मकान के मालिक मर चुके या बहरे है

किसके तन की रंगीनी मौज़ज़न है सीने में
आँख भी गुलाबी है, अश्क भी सुनहरे है

कैसे में अदब की हद फांद कर पियु शाहिद
रस भरी उन आँखों पर जब हया के पहरे है- शाहिद शैदाई

मायने
जेहन-ए-आदमियत=आदमी के दिमाग पर, मस्लेहत=खुद के भले बुरे की सोच कर फैसला करना, मुख्लिस=निस्वार्थी, मौज़ज़न=लहर की तरह दोड़ना

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