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गर कलम न छीनी गई तो हिन्दुस्तान बदलकर छोडूँगा!
इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!!

मै देख रहा हू भूख उग रही है गलियों बाजारों में,
मै देख रहा हू ढूंढ रही बेकारी कफ़न मज़ारों में,
मै देख रहा हू कला बन गई है तिजोरियो की चाबी,
मै देख रहा इतिहास कैद है चांदी की दीवारों में,
मै देख रहा हू दूध उगलने वाली धरती प्यासी है,
मै देख रहा हर दरवाजे पर छाई मौत उदासी है,
मै देख रहा मुठ्ठी भर दाने पर बिकता सिंदूर खड़ा
मै देख रहा हर सुबह सूर्य के ही घर में सन्यासी है
खुद मिट जाऊँगा या यह सब सामान बदलकर छोडूँगा!
इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!!

मै अंगारे ही गाऊँगा जब तक दिनमान न निकलेगा,
आंधी खुद ही बन जाऊँगा जब तक तूफ़ान न निकलेगा,
मै यु ही अपने शीश रहूँगा पहने ताज कफ़नवाला
जब तक मेरे शव पर चढ़कर मेरा बलिदान न निकलेगा,
मेरा है प्रण जब तक यह काली निशा नहीं उजियाली हो
तब तक रौशनी सकल जग को मेरे लोहू की लाली हो,
मेरा है कौल कि आता है जब तक न यहा मधुमास नया
तब तक मेरी ही कलम मुरझाती बगिया कि हरियाली हो
मै स्वर का नया शहीद साज हर गान बदलकर छोडूँगा!
इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!!

मुझको फांसी का फंदा दिखलाकर तुम मोड नहीं सकते,
मुझ पर तलवारे अजमाकर मुझको तुम तोड़ नहीं सकते,
बेदी-हथकड़ीयो से मेरी मिटटी ही बस बंध सकती है,
मेरे विद्रोही गानों पर तुम गाठे जोड़ नहीं सकते,
मै उस माँ का बेटा हू जिसकी गोद लहू से लथपथ है,
मै उस बहना का फुल कि जिसका पतझारो का ही पथ है,
मै उस चिराग कि ज्योति जला तो जीवन-भर तुफानो में
मै उसका सेज-सुहाग मरण-आलिंगन ही जिसका व्रत है,
मै नवयुग-निर्माता हू रूढ़ी-विधान बदलकर छोडूँगा!
इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!!

मै उन्हें चाँद दूँगा जिनके घर नहीं सितारे जाते है,
मै उन्हें हँसी दूँगा जिनके घर फूल नहीं हँस पाते है,
मै उनका तीरथ हूँ जिनके पैरों कि मिटटी काशी है
उनका सावन हूँ जो रेगिस्तानो से हाथ मिलाते है,
वे सभी उजाले में आये जो अंधियारे में खोये है,
वे सभी देश गौरव हो जो निज श्रम से दीप संजोये है,
तुमसे कोई दुश्मनी नहीं बस इतना कहना है मेरा
वे सभी हँसे जो रोये है, वे सभी जगे जो सोये है,
गर यह न हुआ तो सचमुच तीर-कमान बदलकर छोडूँगा!
इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!!- गोपालदास नीरज

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