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शहरयार साहब को पिछले हफ्ते ज्ञान पीठ पुरस्कार मिला तो उनके बारे में लिखा गया नौमान शौक का पुराना लेख आपके लिये पेश है:-

शहरयार का नाम ग़ज़ल के चाहनेवालो के लिए नया नहीं| उनकी शायरी का दौर उर्दू में जदीदियत के शबाब का दौर था| प्रगतिशीलता की प्रतिक्रिया के टूर पर लिखी जानेवाली गज़लों और नज्मो से पात्र-पत्रिकाओ के पन्ने अटे पड़े थे| जिनकी शायरी किसी की समझ में न आये बड़े शायर वही माने जाते थे| फैशन के तहत लिखनेवालो की इस भीड़ में चंद शायर ऐसे भी थे जिन्होंने संजीदगी और तन्मयता से ऐसे शेर कहने में अपनी और शायरी की भलाई समझी जो बाद में भी अच्छी शायरी के कद्रदानों को अच्छी लग सके वरना उस ज़माने में जिनकी बीस-बीस गज़ले पत्रिकाओ में प्रमुखता से छापी जाती थी वैसे शायरों के नाम भी अब पाठकों को याद नहीं|

शहरयार मध्दम लहजे के शायर है अपने तजुर्बे और मुशाहदे की रौशनी में सफर करते हुए, जहा खुद रुकते है पढनेवाला भी उनके साथ रुक जाता है| लहजे की सादगी और कशिश अपना जादू रखती है| कही कोई दिखावा और मशक्कत नहीं:

अब रात की दीवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मीं कुछ कम है

उम्मीद से कम चश्मे-खरीदार में आये
हमलोग ज़रा देर से बाजार में आये

हुजूम देखता हू मै कांप उठता हू
अगरचे खौफ नहीं अब किसी के खोने का

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को
मै देखता रहा दरिया तिरी रवानी को

कौन सा कहर ये आँखों पे हुआ है नाज़िल
एक मुद्दत से कोई ख्वाब न देखा हमने

ऐ शहर तीर नामो-निशाँ भी नहीं होता
जो हादसे होने थे अगर हो गए होते


ये अशआर आधुनिक ग़ज़ल के हवाले से उर्दू में इतनी बार कहे गए है की नयी नस्ल के अवचेतन का हिस्सा बन चुके है| इन शेरो की व्याख्या करके मै इनका हुस्न गवाना नहीं चाहता| आप खुद अंदाजा लगा सकते है की इस तरह के शेर कहने वाले शायर को हम पुराने और नए के खाने में फिट करके नहीं देख सकते| पुराणी शब्दावली को नए परिवेश में इस तरह इस्तेमाल करना की ताज़गी पर ज़रा आंच न आये, आसान काम तो हरगिज़ नहीं है|

लफज ख्वाब उनका निहायत पसंदीदा प्रतिक है जिसे शहरयार ने अपनी नज्मो और गज़लों में बड़ी उदारता के साथ इस्तेमाल किया है| एक दुनिया जो शायर की सोचो में है और एक दुनिया जिसमे शायर जी रहा है- इन दोनों के बीच जो कुछ ही सकता है – एक तीसरी दुनिया है| सच्चाई और ख्वाब के बीच इस तरह का टकराव शहरयार की शायरी का बुनियादी सरोकार है|

शहरयार ने साडी जिंदगी शेर कहे और अब तक कह रहे है लेकिन कमाल ये है कि उनके यहाँ आमियानापन या गैर संजीदगी बिलकुल नहीं बल्कि कभी-कभी तो ये अहतियात भी भारी लगने लगती है| उन्होंने नज्मे भी अच्छी खासी तादाद में कही है लेकिन उनकी पहचान का सबसे अहम हवाला ग़ज़ल और सिर्फ ग़ज़ल है, जो अपनी अलग-अलग खुबियो कि वजह से पाठकों के अलग-अलग हल्कों में पसंद की जाती है|
ए-501, प्रसार कुञ्ज, फर्स्ट क्रास एबेन्यु, सेक्टर पाई वन, ग्रेटर नॉएडा-201308

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