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तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है

जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार
वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है

हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा
ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है

ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस
कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है

उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है

ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो
बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है- जाँ निसार अख्तर

मायने
हदूद-ए-जात=अस्तित्व की सीमाओ, रकीब=प्रतिद्वंदी, मरासिम=मेल-जोल/प्रेम व्यवहार, उफ़क=क्षितिज, चिराग-ए-दयार-ए-हबीब=मित्र के नगर का दीपक, बलंद=ऊँची, साहिल=किनारा

Roman

tu is kadar mujhe apne kareeb lagta hai
tujhe alag se jo sochu ajeeb lagta hai

jise na husn se matlab na ishq se sarokar
wo shakhs mujh ko badnaseeb lagta hai

hudud-e-jaat se bahar nikal ke dekh jara
na koi gair, na koi raqeeb lagta hai

ye dosti, ye marasim, ye chahte, ye khulus
kabhi kabhi ye sab kuch ajeeb lagta hai

ufaq pe door chamkata hua koi tara
mujhe chirag-e-dayar-e-habeeb lagta hai

na jane kab koi tufan aayega yaro
buland mouj se sahil kareeb lagta hai - Jan Nisar Akhtar / Jaan Nisar Akhtar



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  1. वाह बेहतरीन प्रस्तुति।

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  2. ह्दूदे जात से बहार निकल के देख जरा
    ना कोई गैर ना कोई रकीब लगता है

    सुभान अल्लाह...जाँ निसार साहब की लाजवाब ग़ज़ल हम तक पहुँचाने का शुक्रिया...

    नीरज

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  3. dam hai
    kham hai
    gum hai quki ham neelesh ohja hai

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