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निदा फ़ाज़ली के बारे में जितना कहा जाये उतना कम है | आप एक मशहूर शायर और लेखक है, आपने कई शायरों पर लेख लिखे है जिनमे से ग़ालिब पर लिखा यह लेख पेश है |

ग़ालिब अपने युग में आने वाले कई युगों के शायर थे, अपने युग में उन्हें इतना नहीं समझा गया जितना बाद के युगों में पहचाना गया| हर बड़े दिमाग़ की तरह वह भी अपने समकालीनों की आँखों से ओझल रहे|

भारतीय इतिहास में वह पहले शायर थे, जिन्हें सुनी-सुनाई की जगह अपनी देखी-दिखाई को शायरी का मैयार बनाया, देखी-दिखाई से संत कवि कबीर दास का नाम ज़हन में आता है- तू लिखता है कागद लेखी, मैं आँखन की देखी|

लेकिन कबीर की आँखन देखी और ग़ालिब की देखी-दिखाई में थोड़ा अंतर भी है| कबीर सर पर आसमान रखकर धरती वालों से लड़ते थे और आखिरी मुगल के दौर के मिर्ज़ा ग़ालिब दोनों से झगड़ते थे, इसी लिए सुनने और पढ़ने वाले उनसे नाराज़ रहते थे| लालकिले के एक मुशायरे में, ख़ुद उनके सामने उनपर व्यंग किया गया:

कलामे मीर समझे या कलामे मिर्ज़ा समझे
मगर इनका कहा यह आप समझें या ख़ुदा समझे


मीर और मिर्ज़ा से व्यंगकार की मुशद ग़ालिब से पहले के शायर मीर तकी मीर और मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा थी| ग़ालिब को इस व्यंग्य ने परेशान नहीं किया| उन्होंने इसके जवाब में ऐलान किया:

न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही


मिर्ज़ा ग़ालिब का यह आत्मविश्वास उनकी महानता की पहचान है| ग़ालिब की तरह रघुपति सहाय फ़िराक़ भी अपने ज़माने में आलोचना का निशाना बने, लेकिन वह अपनी डगर से नहीं डिगे| उन्होंने वही लिखा जो भोगा और जिया और अपने आलोचकों को अपने जीवनकाल में यूँ जवाब दिया था|

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