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मेरी बेखुदी का तसलसुल बनाये नहीं रख सका
ज्यादा दिनों तक वो खुद को सजाये नहीं रख सका

मै खोया तो इसमें ज्यादा खता भी उसी की ही थी
वही भीड़ में मुझ पे आँखे जमाए नहीं रख सका

सरे-आईना भी सरापा मेरा धुंध ही धुंध है
मै खुद को कभी अक्स के साये-साये नहीं रख सका

ज़माने से शिकवा तो खुद को तसल्ली ही देने सा है
मै खुद उसके बारे में कोई भी राये नहीं रख सका

कुछ ऐसा हुआ फिर की मुझको अँधेरे ही रास आ गये
तेरे लौटने तक मै शम्मे जलाये नहीं रख सका- शारिक कैफी

मायने
बेखुदी=बेसुधपन, तसलसुल=निरंतरता, सरे-आईना=दर्पण के सामने, सरापा=सर से पाँव तक, अक्स=प्रतिबिम्ब

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