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अंदाज हू-ब-हू तेरी आवाजे-पा का था
देखा निकलके घर से तो झोका हवा का था

उस हुस्ने-इत्तिफाक पे लूटकर भी शाद हू
तेरी रजा जो थी, वो तकाज़ा वफ़ा का था

दिल राख हो चुका तो चमक और बढ़ गई
यह तेरी याद थी कि अमल कीमिया का था

इस रिश्ता-ए-लतीफ़ के असरार क्या खुले
तू सामने था और तसव्वुर खुदा का था

छुपछुप के रोऊ और सरे अंजुमन हसू
मुझको यह मशविरा मेरे दर्दे-आशना का था

उठ्ठा अजब ताजाद से इंसान का खमीर
आदि फ़ना का था तो पुजारी बका का था

टुटा तो कितने आईना-खानों पे ज़द पड़ी
अटका हुआ गले में जो पत्थर सदा का था

हैरान हू कि दार से कैसे बचा ‘नदीम’
वह शख्स तो गरीबो-गयूर इंतहा का था – अहमद नदीम कासमी
मायने
शाद=खुश, कीमिया=रसायन, लतीफ़=पवित्र, असरार=राज़, तसव्वुर=ख्याल/कल्पना, आशना=परिचित/जानकार, तज़ाद=विरोध, फ़ना=मौत, बका=जिंदगी, दार=फ़ासी, गरीबो-गयूर=कंगाल और गैरतमंद

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