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सीमाब अकबराबादी, अबू बक्र सिद्दीकी ( इस्लाम के पहले खलीफा ) के वंशज थे काकू गली, नई मंडी, आगरा इमलीवाले मकान में सन 1880 में पैदा हुए थे | आपके पिता का नाम मोहम्मद हुसैन सिद्दीकी था जो कि स्वयं एक उर्दू कवि, कई पुस्तकों के लेखक, हाकिम अमिरुल्दीन अत्तार अकबराबादी के शिष्य और भारत प्रेस, अजमेर के टाइम्स के एक कर्मचारी भी थे | आपका असल नाम शेख आशिक़ हुसेन  था | सीमाब कहते थे कि आपके पिता मुगल सम्राट, जहांगीर के शासनकाल के दौरान बुखारा से आगरा आ गए और यही अपना घर बना लिया | परन्तु मोहन लाल (इतिहासकार) के अनुसार आपके दादाजी औरंगजेब के शासनकाल के दौरान बुखार छोड आगरा चले गए थे |

आपने फ़ारसी और अरबी जमालुद्दीन सरहदी से और अहमद रशीद गांगुली से तर्क की शिक्षा प्राप्त की | इसके अतिरिक्त आपने एफ़.ए. तक अंग्रेज़ी भी पढ़ी | 1897 में अपने पिता की असामयिक निधन के कारण आपको अपनी शिक्षा बीच में ही छोडनी पड़ी |
आपने ग़ज़ल लिखना 1892 से ही शुरू कर दिया था और सन 1898 में आपने नवाब मिर्ज़ा खान दाग देहलवी (1831–1905) को अपना उस्ताद बना लिया | जिनसे आपकी मुलाकात मुंशी नज़र हुसैन सखा देहलवी ने कानपुर रेलवे स्टेशन पर करवाई थी |

आपने पहले आगरा फिर कानपुर में कार्य करते रहे तत्पश्चात आपने अजमेर में रेल सेवा में कार्य शुरू किया जहा से आपने 1922 में इस्तीफा दे दिया | रेल सेवा से इस्तीफा देने के बाद आपने वर्ष 1923 में कसर उल अदब, एक प्रकाशन घर की स्थापना सागर निजामी के साथ की | जहा आपने मासिक पत्रिका पैमाना प्रकाशित करना शुरू की | 1929 में आपने साप्ताहिक “ताज” का प्रकाशन शुरू किया और 1930 में मासिक “शेर” | पैमाना का प्रकाशन 1932 में बंद कर दिया गया जब सागर निजामी सीमाब से अलग हो गए और मीरुत को चले गए | “शेर” का प्रकाशन सीमत की म्रृत्यु के बाद भी जारी रहा जो की आपके पुत्र एजाज़ सिद्दीकी द्वारा जारी रखा गया |
आपकी माली हालत कभी ठीक नहीं रही फिर भी आप हमेशा शेरवानी, तुर्की टोपी और सफ़ेद पैजामे में दिखाई देते थे | इकबाल और हाली की तरह आप भी दिल से लिखते थे जिस कारण आपने सभी सामाजिक और राजनीतिक पहलुओ पर लिखा | 16 अगस्त 1948 में अपनी महान कृति “वही-ए-मंजूम” (कुरान का पद्य रूप में उर्दू अनुवाद ) के प्रकाशन के लिए लाहोर फिर कराची गए | आप प्रकाशक ढूंढने में असफल रहे | तब आप आगरा नहीं आ पाए और 1949 में भारी स्ट्रोक से बीमार हुए और फिर उससे उभर नहीं पाए और 31 जनवरी 1951 को आप कराची में जन्नतनशी हुए | कुरान का वह अनुवाद आपकी मृत्यु के तीस साल बाद प्रकाशित हुआ |

आपका पहला काव्य संग्रह “नैस्तान” 1923 में प्रकाशित हुआ और सन 1982 में आपकी 75 किताबे प्रकाश में आई जिनमे आपकी 22 किताबे शायरी की थी जिनमे “लोह-ए-महफूज़ (1979)”,  “वही-मंजूम (1981)” और “साज़-ए-हिजाज़ (1982)” भी शामिल है जो की आपकी मृत्यु के काफी समय बाद प्रकाशित हुई | आप अपनी गज़लों से जाने जाते है जिनमे भी वे जो की कुंदन लाल सहगल के द्वारा गाई गयी थी | आपने गज़लों के अतिरिक्त लघु कहानिया, उपन्यास, नाटक, जीवनी, और आलोचनात्मक मूल्यांकन भी लिखे | आपको उर्दू, फारसी और अरबी भाषा के विशेषज्ञ माना गया | 

आपके करीब 375 शिष्य थे जिनमे प्रमुख सागर निजामी (1905-1983), मेहर लाल सोनी ज़िया फतेहाबादी (1913-1986), राज़ चांदपुरी (1892-1969), बिस्मिल सईदी (1902-1972), अल्ताफ मशहदी (1914-1991), ज़िया जालंधरी (1923), निस्सार इटावी, शिफा ग्वालियरी (1912-1968), नाजिश प्रतापगढ़ी (1924-1981), तुर्फा कुरैशी और हाफिज मजहर उद्दीन रामदासी (1914-1981) | आपकी कई गजले कई गायकों ने गयी है जिनमे कुंदन लाल सहगल प्रमुख है |

आपकी कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम है - नैस्तान (1923),इलहाम-ए-मंजूम (1928),कार-ए-इमरोज़ (1934), कलीम-ए-आजम (1936),दस्तूर-उल-इस्लाह (1940), साज़-ओ-आहंग (1941),कृष्ण गीता(1942), आलम आशुल (1943),सदरह अलमंतहा(1946), शेर-ए-इन्कलाब(1947),लोह-ए-महफूज़(1979), वही-ए-मंजूम(1981)

आप पर कई किताबे लिखी गयी जिनमें प्रमुख है दास्ताँ-ए-चाँद (राज चांदपुरी), इस्लाह-उल-इस्लाह Vol.-4 (लाला श्रीराम), ज़िक्र-ए-सीमाब और सीमाब बनाम ज़िया (मैहर लाल सोनी ज़िया फतेहाबादी), सीमाब अकबराबादी (डा. मनोहर सहाय अनवर M.A.PhD), रूह-ए-मुकातिब (सागर निजामी), सीमाब की नजमिया शायरी (डा. ज़रीना सानी M.A.PhD), सीमाब और दबिस्तान-ए-सीमाब (डा. इफ्तिखार अहमद फखर M.A.PhD )
आइये सुनते है  कुंदन लाल सहगल की आवाज में आपकी एक ग़ज़ल |


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