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ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तगू करते

पयाम बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शर की आरज़ू करते

मेरी तरह से माह-ओ-महर भी हैं आवारा
किसी हबीब को ये भी हैं जुस्तजू करते

जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
असीर होने के आज़ाद आरज़ू करते

न पूछ आलम-ए-बरगश्ता तालि-ए-"आतिश"
बरसती आग में जो बाराँ की आरज़ू करते
                             -ख़्वाजा हैदर अली आतिश
मायने
मयस्सर=उपलब्ध, शार=शरारत, चंचलता, माह-ओ-मेहर=चाँद और सूर्य, हबीब=मित्र, असीर=बन्दी, बरगश्ता=पलटना, विपरीत होना, उलटना,  बारां=वर्षा, ताली=भाग्य,  आतिश=अग्नि,

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