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हुस्न-ए-अहसास निखरता है ग़ज़ल कहने में
आदमी खुद भी सवरता है ग़ज़ल कहने में

लम्हा बीता के सदी बीत गई हो जैसे
वक़्त ऐसे भी गुजरता है ग़ज़ल कहने में

फ़िक्र मामिन की, जुबा दाग की, ग़ालिब का बयाँ
अब भला कौन यह करता है ग़ज़ल कहने में

हुबहू जैसे कि खय्याम कि तस्वीरे है
हुस्न सागर में उतरता है ग़ज़ल कहने में

है उजाला भी, मसर्रत भी, सुकूने दिल भी
वही जज्बा जो उभरता है ग़ज़ल कहने में

किसने छेड़ा ये नया राग जकी होगा जकी
तजुर्बे वही तो करता है ग़ज़ल कहने में
                                        - महमूद जकी
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