1
हिंद के गुलशन में जब आती है होली की बहार
ज़फिशानी चाही कर जाती है होली की बहार

एक तरफ से रंग पड़ता, एक तरफ उड़ता गुलाल
ज़िन्दगी की लज्जते लाती है, होली की बहार

ज़ाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब
मुझको तुझ बिन यार तरसाती है होली की बहार

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां
तो तो काफ़िर हो जिसे बहती है होली की बहार

नौ बहारो से तू होली खेलले इस दम 'नज़ीर' 
फिर बरस दिन के ऊपर जाती है होली की बहार 
                                                      - नज़ीर अकबराबादी
मायने
ज़फिशानी=पैरहन/वस्त्र
क्या आपने इस ब्लॉग(जखीरा) को सब्सक्राइब किया है अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के द्वारा सब्सक्राइब करना न भूले |

Post a Comment

 
Top