0
गमे-दुनिया से गर पाई भी फुर्सत उठाने की
फलक का देखना, तकरीब तेरे याद आने की

खुलेगा किस तरह मजमुं मेरे मक्तूब का यारब
कसम खाई है उस काफ़िर ने काग़ज के जलने की

लिपटना परनिया में शौला-ए-आतश का आसां है
वले मुश्किल है हिकमत दिल में सोजे-ग़म छिपाने की

उन्हें मंजूर ए जख्मियो का देख आना था
उठे सैरे-गुल को देखना शोखी बहाने की

हमारी सादगी भी इल्तफाते -नाज पर मरना
तेरा आना न था जालिम मगर तमहीद जाने की

लकद कोबे-हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती
मेरी ताकत की जालिम थी बुतों के नाज उठाने की

कहू क्या खूबी-ए-मौजा-ए-इब्न-ए-जमा ग़ालिब
बड़ी की उसने, जिससे की थी हमने बारहा नेकी

मायने
मक्तूब=पत्र, परनिया=मखमल, इल्तफाते-नाज=प्रेयसी की कृपा, तमहीद=प्रारंभ, कोबे-हवादिस=मुसीबत की ठोकरे, तहम्मुल=सहन, खूबी-ए-मौजा-ए-इब्न-ए-जमा=दुइय वालो के स्वभाव की अच्छाई

मिर्ज़ा ग़ालिब के लेखो से खुद को अपडेट रखने के लिए क्या आपने ब्लॉग को सब्सक्राइब किया अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के जरिये सब्सक्राइब कीजिये |

Post a Comment Blogger

 
Top