1
एक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
जिन्दगी काहे को है, ख्वाब दीवाने का

जिन्दगी भी तो पशेमां है यहाँ लाके मुझे
ढूंढ़ती है कोई हिला मेरे मर जाने का

तुने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग
आओ, देखो न तमाशा मेरे गमखाने का

अब इसे दार पे ले जाके सुला से सकी
यु बहकना नहीं अच्छा तेरे दीवाने का

दिल से पहुची तो है आँखों में लहू की बुँदे
सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का

हर नफास उम्रे-गुजश्ता की है मय्यत 'फ़ानी'
जिन्दगी नाम है मर-मरके जिए जाने का
                                                     - फ़ानी बदायुनी      
मायने
मुअम्मा=पहेली, पशेमां=लज्जित, दार=सूली, शीशे=बोतल, नफास=श्वास, उम्रे-गुजश्ता=बीती आयु, मय्यत=शव
क्या आपने इस ब्लॉग(जखीरा) को सब्सक्राइब किया है अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के द्वारा सब्सक्राइब करना न भूले |

Post a Comment Blogger

  1. बेहतरीन गज़ल पढवाने के लिये धन्यवाद।

    ReplyDelete

 
Top