3
किरदार पर गुनाह की कालिख लगा के हम
दुनिया से जा रहे है यह दौलत कमा के हम

जितनी तव्क्कुआत जमाने को हम से है
उतनी तो उम्र भी नहीं लाए लिखा के हम

क्या जाने कब उतार पे आ जाए ये पतंग
अब तक तो उड़ रहे है सहारे हवा के हम

फिर आसुओ ने हमको निशाने पे रख लिया
एक बार हस दिए थे कभी खिलखिला के हम

कुछ और बढ़ गया है अँधेरा पड़ोस का
शर्मिंदा हो रहे है दिये को जला के हम

हम कोहकन मिजाजो से आगे की चीज़ है
ढूंढेगे मोतियों को समुन्दर सुखा के हम - मुनव्वर राना

Roman

kirdar par gunah ki kalikh laga ke ham
duniya se ja rahe hai yah doulat kama ke ham

jitni twkkuaat jamane ko ham se hai
utni to umr bhi nahi laye likha ke ham

kya jane kab utar pe aa jaye patang
ab tak to us rahe hai sahare hawa ke ham

fir aansuo ne hamko nishane pe rakh liya
ek bar has diye the kabhi khilkhila ke ham

kuch aur badh gaya hai andhera pados ka
sharminda ho rahe hai diye ko jala ke ham

ham kohkan mizajo se aage ki cheej hai
dhundhenge motiyo ko samundar sukha ke ham - Munwwar Rana

Post a Comment Blogger

  1. मुन्नवर राणा को पढना हमेशा ही अच्छा लगता है.. बढ़िया ग़ज़ल..

    ReplyDelete
  2. आप लिखते ही रहे ..हम जी लेंगे जिंदगी

    ReplyDelete

 
Top