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तेरे-मेरे दीन का मसअला नहीं, मसअला कोई और है
न तेरा खुदा कोई और है न मेरा खुदा कोई और है

मै जहा हू सिर्फ वही नहीं, मै जहा नहीं हू वहा भी हू
मुझे यु न मुझमे तलाश कर की मेरा पता कोई और है

मेरे फैसलों से खफा है जो, मेरे हौसलों से डरा है जो
मेरे साथ ही मेरी शख्सियत में छुपा हुआ कोई और है

वो भी वक़्त था की जब आसमाँ पे धुए का नामो-निशां न था
मगर अबके आग है कुछ अलग, मगर अब हवा कोई और है

तुझे खुद से कोई गिला नहीं, मुझे खुद में मै ही मिला नहीं
तेरा आईना कोई और है मेरा आईना कोई और है

जिस उफुक पे मै था किरण-किरण, हू उस उफुक पे धुआ-धुआ
मेरी इब्तदा कोई और थी, मेरी इन्तहा कोई और है

मेरे फिक्रो-फन का गुरुर वो,  मेरे हर सुखन का सुरूर वो
मेरा जहाँ ऐसा रबाब हो जिसे छेड़ता कोई और है
                                                  - राजेश रेड्डी
मायने
उफुक=आसमाँ, फिक्रो-फन=गुण की चिंता, इब्तदा=शुरुआत, इन्तहा=अंत
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  1. बहुत सुंदर गजल जी धन्यवाद

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  2. बेहद खूबसूरत ग़ज़ल !

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