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हाय क्या चीज़ थी, क्या चीज़ थी जालिम की नज़र भी
उफ़ करके वही बैठ गया दर्दे-जिगर भी

होती ही नहीं कम सबे-फुरकत की सियाही
रुखसत हुई क्या शाम के हमराह सहर भी

ये मुजरिमे-उल्फत है, वो मुजरिमे-दीदार
दिल ले के चले हो तो लिए जाओ नजर भी

क्या देखेंगे हम जलवा-ए-महबूब की हम से
देखी न गई देखने वालो की नजर भी

है फैसला-ए-इश्क ही मंजूर तो उठिए
अंगियार भी मौजूद है, हाजिर है जिगर भी
                                    - जिगर मुरादाबादी

मायने
शबे-फुर्कत=जुदाई की रात, सहर=सुबह, अंगियार=गैर, दुसरे लोग, प्रेम में प्रतिद्वंदी
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