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उस शाम वो रुखसत का समा याद रहेगा
वो शहर, वो कूचा, वो मका याद रहेगा

वो टीस की उभरी थी इधर याद रहेगा
वो दर्द की उभरा थी उधर याद रहेगा

हां बज्मे-शबाना में हमाशौक जो उस दिन
हम थे तेरी जानिब निगरा याद रहेगा

कुछ मीर के अबियत थे, कुछ फैज़ के मिसरे
इक दर्द का था जिनमे बयाँ, याद रहेगा

हम भूल सके है, न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें, हां याद रहेगा- इब्ने इंशा
मायने
बज्मे-शबां=रात कि महफ़िल, हमाशौक=बड़े शौक से, निगरा=देखने वाले, अबियात=शेर, मिसरे=कविता कि लाइने

Roman

us shaam wo rukhsat ka samayaad rahega
wo shahar, wo kuncha, wo makaan yaad rahega

wo tees ki ubhri thi idhar yaad rahega
wo dard ki ubhra tha udhar yaad rahega

ha bazm-e-shabana me hamshouk jo us din
ham the teri zanib nigra yaad rahega

kuch meer ke abiyat the, kuch faiz ke misre
is dard ka tha jinme bayaan, yaad rahega

ham bhul chuke hai, n tujhe bhul sakenge
tu yaad rahega hame, haa yaad rahega - Ibne Insha

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