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परवाज में कुछ है, कोई पर तोल रहे है,
उड़ जायेंगे पंछी जो यहाँ बोल रहे है |

करते है तुझे याद, जो ले-ले के तेरा नाम,
हमराज़ ही सब राज़ तेरा खोल रहे है |

साथी तो पहुच भी गए मंजिल पे कभी के,
हम है कि अभी शाख पे पर तोल रहे है |

खिल-खिल के कहा गुंचो ने रोज़ चमन में,
हम उम्दा-ए-हस्ती कि गिरह खोल रहे है |

ये अहद था फिर उनसे न बोलेंगे कभी हम,
मजबूर है इस दिल से मगर बोल रहे है | - बिस्मिल भरतपुरी / Bismil Bharatpuri

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  1. ग़ज़ल का मतला अच्छा लगा लेकिन खिल-खिल के कहा गुंचों ने रोज चमन में वाले मिसरे में.. कहा रोज की जगह..मुझे लगता है.... कहा इक रोज चमन में होना चाहिए.

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  2. धन्यवाद आपकी टिपण्णी के लिए परन्तु मैंने शायर की ग़ज़ल वैसी की वैसी ही लिखी है जैसी उन्होंने लिखी थी मैंने उसमे कोई फेरबदल नहीं किया है |

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