2

परवाज में कुछ है, कोई पर तोल रहे है,
उड़ जायेंगे पंछी जो यहाँ बोल रहे है |

करते है तुझे याद, जो ले-ले के तेरा नाम,
हमराज़ ही सब राज़ तेरा खोल रहे है |

साथी तो पहुच भी गए मंजिल पे कभी के,
हम है कि अभी शाख पे पर तोल रहे है |

खिल-खिल के कहा गुंचो ने रोज़ चमन में,
हम उम्दा-ए-हस्ती कि गिरह खोल रहे है |

ये अहद था फिर उनसे न बोलेंगे कभी हम,
मजबूर है इस दिल से मगर बोल रहे है | - बिस्मिल भरतपुरी / Bismil Bharatpuri

Post a Comment

  1. ग़ज़ल का मतला अच्छा लगा लेकिन खिल-खिल के कहा गुंचों ने रोज चमन में वाले मिसरे में.. कहा रोज की जगह..मुझे लगता है.... कहा इक रोज चमन में होना चाहिए.

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद आपकी टिपण्णी के लिए परन्तु मैंने शायर की ग़ज़ल वैसी की वैसी ही लिखी है जैसी उन्होंने लिखी थी मैंने उसमे कोई फेरबदल नहीं किया है |

    ReplyDelete

 
Top