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मौत की वीरानियो में जिन्दगी बनकर रहा
वो खुदाओ के शहर में आदमी बनकर रहा

जिन्दगी से दोस्ती का ये सिला उसको मिला
जिन्दगी भर दोस्तों में अजनबी बनकर रहा

उसकी दुनिया का अँधेरा सोचकर तो देखिये
वो जो अन्धो की गली में रौशनी बनकर रहा

सनसनी के सौदेबजो से लड़ा जो उम्रभर
हश्र ये खुद एक दिन वो सनसनी बनकर रहा

एक अंधी दोड की अगुवाई को बैचैन सब
जब तलक बिनाई थी मै आखिरी बनकर रहा
                                                -संजय ग्रोवर 
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  1. वो खुदाओं के शहर में आदमी बनकर रहा....बहुत खूब...अच्छी ग़ज़ल है. इसके शेरों में रवानी है.

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