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रस्ता भी कठिन, धुप में शिद्दत भी बहुत थी
साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी
 
खेमे न कोई मेरे मुसाफ़िर के जलाए
जख्मी था बहुत पाँव, मुसाफत भी बहुत थी

सब दोस्त मेरे मुंतजिरे-पर्दा-ए-शब् थे
दिन में तो सफ़र करने में दिक्कत भी बहुत थी

कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आए
और कुछ मेरी मिटटी में बगावत भी बहुत थी

इस तर्के-रिफाकत पे परीशां तो हू लेकिन
अब तक तेरे साथ पे हैरत भी बहुत थी

खुश आए तुझे शहरे-मुनाफ़िक़ की अमीरी
हम लोगो को सच कहने की आदत भी बहुत थी
                                         - परवीन शाकिर
मायने 
खेमा=तम्बू, मुसाफत=दुरी, मुंतजीरे-पर्दा-ए-शब्=रात होने के इंतजार में, तर्के-रिफाक़त=साथ छोड़ना, खुश आना=शुभ होना, शहरे-मुनाफ़िक़=ऐसा शहर जिसके लोग ऊपर से कुछ हो और अन्दर से कुछ, अमीरी=शासन

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