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थी अपनी हद में धुल, अभी कल की बात है
राहों के थे उसूल, अभी कल की बात है

काफी थी एक ठेस बिखरने के वास्ते
इंसान भी थे फुल, अभी कल की बात है

उम्रो का वो लिहाज़ की बरगद की राह में
आते न थे बाबुल, अभी कल की बात है

दोनों ही एक दाल के पंछी की तरह थे
ये राम वो रसूल, अभी कल की बात है

आती थी बात जब भी वतन के बकार की
क़ुरबानी थी क़ुबूल, अभी कल की बात है

अपनी तो खैर गिनती दीवानों ही में रही
करते थे तुम भी भूल, अभी कल की बात है
                                     - हस्तीमल हस्ती
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  1. उम्रों का वो लिहाज़ की बरगद की राह में
    आते न थे बबूल अभी कल की बात है

    अपनी तो खैर गिनती दीवानों ही में रही
    करते थे तुम भी भूल अभी कल की बात है

    हस्ती मल जी को पढना उनसे मिलना और उन्हें सुनना हर बार एक नए अनुभव से गुजरने के समान है...हस्ती जी की शायरी दिल की गहराइयों से निकलती शायरी है...उनकी इस ग़ज़ल के किस शेर की तारीफ़ करूँ और किसे छोडूं...मकते से मतले तक का सफ़र बेहद हसीं हैं...शुक्रिया आपका उन्हें पढवाने के लिए.

    नीरज

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