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ये बात फ़कत हम समझे है या दीदा-ए-जाना जाने है
दीदार को इतना होश तो है, आईने को हैराँ जाने है

ए काश कोई खुद आ के कभी इस वहम को दिल से दूर करे
ये कुर्ब को मुश्किल समझे है, यो बौद को आसां जाने है

गुलशन के नज़ारे हस-हस कर उकसाते रहे गुलचीनी पर
आदाबे-चमन से नावाकिफ, तहरीके-गुलिस्ता जाने है

क्या हाल वो था जब अपने लिए एक खाले-रूखे-जेबा था बहुत
क्या आज ये दिल का आलम है, आफाक को जिन्दा जाने है

ए सर्द हवाओ के झोको तुम होश में उसको ला न सके
आगाजे-खिज़ा को 'आफ़ाकी' तमहीदे-बहारा जाने है- जाज़िब आफ़ाकी
मायने
दीद-ए-जाना=प्रियतम की आँख, दीदार=दर्शन, कुर्ब=सामीप्य, बौद=दुरी, गुलचीनी=फुल तोडना, तहरीके-गुलिस्ता=बाग़ की प्रेरणा, खाले-रूखे-जेबा=सुन्दर मुख का तिल, आफाक=क्षितिज, ज़िंदा=कारागार, आगाजे-खिज़ा=पतझड़ की शुरुआत, तमहीदे -बहारा=वसंत के आगमन का संकेत

Roman

ye baat faqat ham samjhe hai ya dida-e-jana jane hai
deedar ko itna hosh to hai, aaine ko hairan jaane hai

e kash koi khud aa ke kabhi si waham ko dil se door kare
ye kurb ko mushkil samjhe hai, yo boud ko aasan jane hai

gulshan ke najare has-has kar uksate rahe gulchini par
aadabe-chaman se nawakif, tahrike-gulista jaane hai

kya haal wo tha jab apne liye ek khale-rukhe-jeba tha bahut
kya aaj ye dil ka aalam hai aafaq ko jinda jane hai

e sard hawao ke jhoko tum hosh me usko la n sake
aagaze-khiza ko afaqi tamhide-bahara jaane hai - Jazib Afaqi

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