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सच तो यह है की गुम हू मै भी
तू नहीं है तो कहा हू मै भी

जिनमे जल बुझ गये अहबाब मेरे
उन मकानों का धुआ हू मै भी

याद करता हू पुरानी बाते
सोचता हू की ज़वा हू मै भी

मुझमे रहती है ये परिया कैसी
क्या कोई अँधा कुआ हू मै भी

झूट ही झूट भरा है मुझमे
किसी मुजरिम का बयाँ हू मै भी

ख्वाब में देख के खुद को 'अल्वी'
ऐसा लगता है की हा! हू मै भी
                                     - मुहम्मद अल्वी

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  1. हा हा हा देखो क्या लिखा है 'अल्वी' ने?
    'सच तो ये है कि गम हूँ मैं भी
    तु नही तो कहाँ हूँ मैं भी'
    याद करता हूँ पुरानी बाते
    सोचता हूँ कि जवाँ हूँ मैं भी'
    जैसे मैंने खुद लिखा हो ये सब बस मेरे लिए.

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