0
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है

आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी और है

बारहा देखीं हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सर-गिराऩी और है

देके ख़त मुँह देखता है नामाबर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है

क़ातर-अ़अ़मार हैं अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है

हो चुकीं "ग़ालिब" बलाएं सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है
मायने
आतिश-ए-दोज़ख़=नरक की आग, सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी=निहित ग़म की गर्मी, मर्ग-ए-नागहानी=आकस्मिक मृत्यु


मिर्ज़ा ग़ालिब के लेखो से खुद को अपडेट रखने के लिए क्या आपने ब्लॉग को सब्सक्राइब किया अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के जरिये सब्सक्राइब कीजिये |

Post a Comment Blogger

 
Top