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जिक्र उस परी-वश का और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आखिर, था जो राजदा अपना

मै वो क्यों बहुत पीते बज्मे-गैर में, यारब
आज ही हुआ मंजूर उनको इन्तहा अपना

मंजर एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता काश की मकाँ अपना

दे वो जिस कदर जिल्लत, हम हसी में टालेंगे
बारे आशना निकला, उनका पासबां अपना

दर्दे-दिल लिखू कब तक, जाऊ उनको दिखला दू
उंगलिया फिगार अपनी, खम खुचकाँ अपना

घिसते-घिसते मिट जाता आपने अबस बदला
नंगे-सिजदा से मेरे संगे आस्ता अपना

ता करे न गम्माजी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में हमने हमजबा अपना

हम कहा के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना

मायने
परी-वश=सुन्दर पारी की तरह, राजदा=भेदी, मित्र, बज्मे-गैर=रकीब की महफ़िल, रकीब=प्रतिद्वंदी, अर्श=आसमान, जिल्लत=अपमान, आशना=जाना-पहचाना, पासबां=दरबान, फिगार=जख्मी, खामा=कलम, खुचका=खून में डूबा हुआ, अबस=व्यर्थ, नंगे सिजदा से=माथा टेकने से आपसे हुए दागो से, संगे-आस्ता=दहलीज़ का पत्थर, गम्माजी=चुगली, दाना=बुद्धिमान, यकता=माहिर, अद्वितीय


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