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बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत उची ईमारत हर घडी खतरे में रहती है

बहुत जी चाहता है कैद -ए-जा से हम निकल जाए
तुम्हारी याद भी मगर इसी मलबे में रहती है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता
मै जब तक घर न पहुचु मेरी माँ सजदे में रहती है - मुनव्वर राना

Roman

Bulandi der tak kis shakhs ke hisse me rahti hai
bahut unchi imarat har ghadi khatre me rahti hai

bahut ji chahta hai kaid-e-jaa se ham nikal jaye
tumhari yaad bhi magar isi malbe me rahti hai

ye aisa karj hai jo mai ada kar hi nahi sakta
mai jab tak ghar n pahuchu meri maa sajde me rahti hai - Munwwar Rana

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  1. मतला लाजवाब है. बाकी शेर मुनव्वर राणा के अपने अंदाज के. ग़ज़ल अच्छी लगी

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