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कटी-फटी हुई तहरीर ले के आया था
अजब नविश्ता-ए-तक़दीर ले के आया था

थकन से चूर परिंदा न जाने किसके लिए
लहू में डूबा तीर ले के आया था

तमाम शहर को जड़ से उखाड़ फेका था
अजीब जज्बा-ए-तामीर ले के आया था

मै बेगुनाह था लेकिन मै इसका क्या करता
गुनहगार की तक़दीर ले के आया था

उसी पे बंद हुए रौशनी के दरवाजे
जो रंग-ए-नूर की जागीर ले के आया था

उधर से खुलती, इधर से लिपटती जाती थी
मै एक अजीब सी जंजीर ले के आया था
                                              - मज़ूर हाशमी
मायने
नविश्ता-ए-तक़दीर=तक़दीर का लिखा, जज्बा-ए-तामीर=निर्माण की भावना

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  1. थकन से चूर परिंदा न जाने किसके लिए
    लहू में डूबा हुआ तीर ले के आया था.
    बहुत अच्छी ग़ज़ल लगी. आप उस्ताद शायरों की ग़ज़लें ज़खीरा में पेश कर बड़ा काम कर रहें हैं. इन्हें पढ़कर कुछ कहने की तहरीक मिलती है.

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  2. ji Jakhira ka uddeshya hi yahi hai ki yaha sabhi shayaro ki kritiya padhne ko mil sake. aapki tippani ke liye dhanywad.

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