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उम्मीद भी किरदार पर पूरी नहीं उतरी,
ये शब् दिल-ए-बीमार पर पूरी नहीं उतरी

क्या खौफ का मंजर था तेरे शहर में कल रात,
सच्चाई भी अखबार पर पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सबकुछ
कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी

मै दुनिया के मयार पर पूरा नहीं उतरा
दुनिया ,मेरे मयार पर पूरी नहीं उतरी- मुनव्वर राना

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  1. मुनब्बर राणा जी की लाजवाब गज़ल प-ाढवाने के लिये आभार।

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  2. बेहतरीन ग़ज़ल पढवाने का बहुत शुक्रिया...

    आपके ब्लॉग को तो तुरंत सुब्स्क्राइब करना चाहिए....

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