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हम भरे शहरो में भी तन्हा है जाने किस तरह - अहमद फ़राज़

तुम जमाना-आशना, तुमसे जमाना ना-आशना
और हम अपने लिए भी अजनबी, ना-आशना

रास्ते भर कि रिफाक़त भी बहुत है जानेमन
वरना मंजिल पर पहुच कर कौन किसका आशना

मुद्दते गुजरी इसी बस्ती में लेकिन अब तलक
लोग नावाकिफ, फ़ज़ा बेगाना, हम ना-आशना

हम भरे शहरो में भी तन्हा है जाने किस तरह
लोग वीराने में भी पैदा कर लेते है आशना

अपनी बर्बादी पे कितने खुश थे हम लेकिन फ़राज़
दोस्त दुश्मन का निकल आया है अपना आशना
                                                 - अहमद फ़राज़

मायने 
आशना=जान-पहचान वाला, जमाना-आशना=ज़माने को समझाने वाले, मौका परस्त, रिफाक़त=साथ

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नींद के पाँव पे पत्थर बन के आते है ख्वाब - कुवर बैचैन

नींद के पाँव पे पत्थर बन के आते है ख्वाब
जख्म देते है उन्हें और टूटते जाते है ख्वाब

आप चाहे तो हमारी पुतलियो से पूछ लों
हमने यादो की रुई से रात भर काते है ख्वाब

नर्म चेहरे और उन पर सख्त चोटों के निशान
सोचिए इनके सिवा अब और क्या पाते है ख्वाब

बंद सीपी में छुपे अनमोल मोती की तरह
अपने अन्दर की चमक खुद ढूंढ़ कर लाते है ख्वाब

नींद में चलने का इनको रोग है लेकिन कुवर
नींद के बाहर भी अक्सर मुझसे टकराते है ख्वाब
                                      - कुवर बैचैन
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नींद के पाँव पे पत्थर बन के आते है ख्वाब - कुवर बैचैन



नींद के पाँव पे पत्थर बन के आते है ख्वाब
जख्म देते है उन्हें और टूटते जाते है ख्वाब

आप चाहे तो हमारी पुतलियो से पूछ लों
हमने यादो की रुई से रात भर काते है ख्वाब

नर्म चेहरे और उन पर सख्त चोटों के निशान
सोचिए इनके सिवा अब और क्या पाते है ख्वाब

बंद सीपी में छुपे अनमोल मोती की तरह
अपने अन्दर की चमक खुद ढूंढ़ कर लाते है ख्वाब

नींद में चलने का इनको रोग है लेकिन कुवर
नींद के बाहर भी अक्सर मुझसे टकराते है ख्वाब- कुवर बैचैन

[slider title="In Roman"]

Nind ke paanv pe patthar ban ke aate hai khwaab
jakhm dete hai unhe aur tutte jaate hai khwaab

aap chahe to hamari putliyo se puchh lo
hamne yaado ki rui se raat bhar kaate hai khwaab

narm chehre aur un par sakht choto ke nishan
sochiye inke siva ab aur kya paate hai khwaab

band sipi me chhue anmol moti ki tarah
apne andar ki chamak khud dhundh kar laate hai khwaab

nind me chalne ka inko rog hai lekin kunwar
nind ke baahar bhi aksar mujhse takraate hai khwaab- Kunwar Baichain[/slider]


उसकी आँखों को गौर से देखो - बशीर बद्र

बेवफा रास्ते बदलते है
हमसफ़र साथ चलते है

किसके आसू छिपे है फूलो में
चूमता हू तो होठ जलते है

उसकी आँखों को गौर से देखो
मंदिरों में चराग जलते है

दिल में रहकर नजर नहीं आते
ऐसे कांटे कहा निकलते है

एक दीवार वो भी शीशे की
दो बदन पास-पास जलते है

कांच के मोतियों के आसू के
सब खिलोने गजल में ढलते है
                        - बशीर बद्र
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उसकी आँखों को गौर से देखो - बशीर बद्र

बेवफा रास्ते बदलते है
हमसफ़र साथ चलते है

किसके आसू छिपे है फूलो में
चूमता हू तो होठ जलते है

उसकी आँखों को गौर से देखो
मंदिरों में चराग जलते है

दिल में रहकर नजर नहीं आते
ऐसे कांटे कहा निकलते है

एक दीवार वो भी शीशे की
दो बदन पास-पास जलते है

कांच के मोतियों के आसू के
सब खिलोने गजल में ढलते है
                        - बशीर बद्र
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अजीब शख्स है बातो में टाल देता है - नसीम निकहत

कोई हसीन सा नुक्ता निकल देता है
अजीब शख्स है बातो में टाल देता है

अब और इससे ज्यादा जवाब क्या देगा
मेरे खुतूत वह दरिया में दाल देता है

हजार फासले होने के बावजूद हमें
बड़ा सुकून किसी का ख्याल देता है

अजब हुनर उसे आता है बेवफाई का
वाह एक लम्हे को सदियों में ढाल देता है

जो मछलियों को सिखाता है तैरना निकहत
वही तो है, जो मछेरो को जाल देता है
                              - नसीम निकहत
मायने 
निकट=बिंदु, खुतूत=पत्र
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अजीब शख्स है बातो में टाल देता है - नसीम निकहत

कोई हसीन सा नुक्ता निकल देता है
अजीब शख्स है बातो में टाल देता है

अब और इससे ज्यादा जवाब क्या देगा
मेरे खुतूत वह दरिया में दाल देता है

हजार फासले होने के बावजूद हमें
बड़ा सुकून किसी का ख्याल देता है

अजब हुनर उसे आता है बेवफाई का
वाह एक लम्हे को सदियों में ढाल देता है

जो मछलियों को सिखाता है तैरना निकहत
वही तो है, जो मछेरो को जाल देता है
                              - नसीम निकहत
मायने 
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तू मिले तो मै तुझे शेर सुनाऊ अपने - अनवर मसउद

क्यों किसी और को दुख-दर्द सुनाऊ अपने
अपनी आखो में भी मै जख्म छुपाऊ अपने

मै तो कायम हू तेरे ग़म की बदोलत वरना
यु बिखर जाऊ कि खुद हाथ न आऊ अपने

शेर लोगो को बहुत याद है औरो के लिए
तू मिले तो मै तुझे शेर सुनाऊ अपने

तेरे रास्ते का जो काँटा भी मयस्सर आए
मै उसे शौक से कालर पे सजाऊ अपने

सोचता हू की बुझा दू मै ये कमरे का दिया
अपने साए को भी क्यों साथ जगाऊ अपने
                                        - अनवर मसउद
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अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है - साहिर लुधियानवी

अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है
रूह गंगा की, हिमालय का बदन आजाद है

खेतिया सोना उगाये, वादिया मोती लुटाये
आज गौतम की जमीं, तुलसी का बन आजाद है

मंदिरों में शंख बाजे, मस्जिदों में हो अजाँ
शेख का धर्म और दीन-ए-ब्रहमन आजाद है
                                         - साहिर लुधियानवी



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अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है - साहिर लुधियानवी

अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है
रूह गंगा की, हिमालय का बदन आजाद है

खेतिया सोना उगाये, वादिया मोती लुटाये
आज गौतम की जमीं, तुलसी का बन आजाद है

मंदिरों में शंख बाजे, मस्जिदों में हो अजाँ
शेख का धर्म और दीन-ए-ब्रहमन आजाद है
                                         - साहिर लुधियानवी



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वो दिन गए की कहते थे नौकर नहीं हू मै




दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हू मै

खाक ऐसी जिन्दगी पे की पत्थर नहीं हू मै

क्यों गर्दिशे-मुदाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हू, प्याला-ओ-साग़र नहीं हू मै

यारब ! जमाना मुझको मिटाता है किसलिए
लोहे-जहा पे हर्फे-मुकरर  नहीं हू मै

हद चाहिए सजा में उकुबत के वास्ते
आखिर गुनहगार हू काफ़िर नहीं हू मै

किस वास्ते अजीज नहीं जानते मुझे ?
लालो -जमुरुर्दो जारो-गौहर नहीं हू मै

रखते हो तुम कदम मेरी आँखों से क्यों दरेग़
रुतबे में मेहर-ओ-माह से कमतर नहीं हू मै

करते हो मुझको मनअ-ए-कदम-बोस किसलिए
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हू मै ?

'ग़ालिब' वजीफाख्वार हो, दो शाह को दुआ
वो दिन गए की कहते थे नौकर नहीं हू मै

मायने
दायम=हमेशा, गर्दिशे-मुदाम=सदा का चक्कर, लोहे-जहा=संसार रूपी तख्ती, हर्फे-मुकरर=दुबारा लिखा गया अक्षर, फालतू, उकुबत=कष्ट, मेहर-ओ-माह=सूरज और चाँद, मनअ-ए-कदम-बोस=कदम चूमने से मना,
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वो भी आखिर मिल गया अब क्या करे - बशीर बद्र

अब किसे चाहे किसे ढूंढा करे
वो भी आखिर मिल गया अब क्या करे

हलकी-हलकी बरिशे होती रहे
हम भी फूलो की तरह भीगा करे

आँख मुंद इस गुलाबी धुप में
देर तक बैठे सोचा करे

दिल, मुहब्बत, दीन, दुनिया, शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करे

घर नया, बर्तन नए, कपडे नए
इन पुराने कागजो का क्या करे
                                -  बशीर बद्र
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ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है - अशोक मिज़ाज

कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है
कभी पीने पिलाने मे ये शीशे टूट जाते है

हम इस धरती के वासी है अगर टूटे तो क्या ग़म है
फलक पर हमने देखा है सितारे टूट जाते है

बहुत कम लोग ऐसे है, जिन्हें रहजन मिले होंगे
ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है

वो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो गया जो हमसे कहता था
जो शीशे जैसे होते है वो एक दिन टूट जाते है

कदम रुकने नहीं देना, सफ़र में ऐसा होता है
नए छले उभरते है पुराने फूट जाते है
                                           - अशोक मिज़ाज
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ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता - मुनव्वर राणा

बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत उची ईमारत हर घडी खतरे में रहती है

बहुत जी चाहता है कैद -ए-जा से हम निकल जाए
तुम्हारी याद भी मगर इसी मलबे में रहती है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता
मै जब तक घर न पहुचु मेरी माँ सजदे में रहती है
                                                  - मुनव्वर राणा
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वो भी आखिर मिल गया अब क्या करे - बशीर बद्र

अब किसे चाहे किसे ढूंढा करे
वो भी आखिर मिल गया अब क्या करे

हलकी-हलकी बरिशे होती रहे
हम भी फूलो की तरह भीगा करे

आँख मुंद इस गुलाबी धुप में
देर तक बैठे सोचा करे

दिल, मुहब्बत, दीन, दुनिया, शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करे

घर नया, बर्तन नए, कपडे नए
इन पुराने कागजो का क्या करे
                                -  बशीर बद्र
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ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता - मुनव्वर राना

बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत उची ईमारत हर घडी खतरे में रहती है

बहुत जी चाहता है कैद -ए-जा से हम निकल जाए
तुम्हारी याद भी मगर इसी मलबे में रहती है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता
मै जब तक घर न पहुचु मेरी माँ सजदे में रहती है
                                                  - मुनव्वर राणा
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ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है - अशोक मिज़ाज

कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है
कभी पीने पिलाने मे ये शीशे टूट जाते है

हम इस धरती के वासी है अगर टूटे तो क्या ग़म है
फलक पर हमने देखा है सितारे टूट जाते है

बहुत कम लोग ऐसे है, जिन्हें रहजन मिले होंगे
ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है

वो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो गया जो हमसे कहता था
जो शीशे जैसे होते है वो एक दिन टूट जाते है

कदम रुकने नहीं देना, सफ़र में ऐसा होता है
नए छले उभरते है पुराने फूट जाते है
                                           - अशोक मिज़ाज
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अभी तो मै जवान हू - हफ़ीज़ जालंधरी

अभी तो मै जवान हू  !

हवा भी खुशगवार है गुलो पे भी निखार है
तरन्नुम हजार है बहार पुरबहार है

कहा चला है साक़िया 
इधर तो लौट इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या 
उठा सुबू, सुबू उठा

सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र समा तो देख बेखबर 

वो काली-काली बदलिया
उफक पे हो गई अया
वो एक हुजुमे-मैकशा
है सु-ए-मैकदा रवा

ये क्या गुमा है बदगुमा समझ न मुझको नातुवा

खयाले-जुहद अभी कहा
अभी तो मै जवान हू

न ग़म कशुदो-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बुद का न हस्त का न वादा-ए-असस्त का

उमीद और यास गुम 
हवास गुम कयास गुम
नज़र से आस-पास गुम
हमा, बजुज़ गिलास गुम

न मय में कुछ कमी रहे कदह से हमदमी रहे
नशिस्त ये ज़मी रहे यही हुमाहुमी रहे

वो राग छेड़ मुतरिबा
तरबफज़ा, अलमरुबा
असर सदा-ए-साज का
जिगर में आग दे लगा

हर एक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया

पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मै जवान हू
                                                   - हफ़ीज़ जालंधरी
मायने
तरन्नुम=संगीत, सुबू=सुराही, सिम्त=और, समा=समय, उफक=क्षितिज, अयाँ=प्रकट, हुजुमे-मैकशा=मद्यपो का समूह, सु-ए-मैकदा रवा=मधुशाला की और जा रहा हू, नातुवा=दुर्बल, ख्याले-जुहद=इन्द्रियनिग्रह का विचार, कशुदो-बस्त=खोलने बंधने, बुद=संभावना, हस्त=अस्तित्व, वादा-ए-असस्त=आदिकाल का प्रण, हमा=सभी कुछ, बजुज़=सिवाय, कदह=प्याला, नशिस्त=महफ़िल, मुतरिबा=गायिका, तरबफज़ा=आनंदवर्धक, अलमरुबा=शौक को उड़ा देने वाला, सदा-ए-साज=साज की आवाज
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अभी तो मै जवान हू - हफ़ीज़ जालंधरी

अभी तो मै जवान हू  !

हवा भी खुशगवार है गुलो पे भी निखार है
तरन्नुम हजार है बहार पुरबहार है

कहा चला है साक़िया 
इधर तो लौट इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या 
उठा सुबू, सुबू उठा

सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र समा तो देख बेखबर 

वो काली-काली बदलिया
उफक पे हो गई अया
वो एक हुजुमे-मैकशा
है सु-ए-मैकदा रवा

ये क्या गुमा है बदगुमा समझ न मुझको नातुवा

खयाले-जुहद अभी कहा
अभी तो मै जवान हू

न ग़म कशुदो-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बुद का न हस्त का न वादा-ए-असस्त का

उमीद और यास गुम 
हवास गुम कयास गुम
नज़र से आस-पास गुम
हमा, बजुज़ गिलास गुम

न मय में कुछ कमी रहे कदह से हमदमी रहे
नशिस्त ये ज़मी रहे यही हुमाहुमी रहे

वो राग छेड़ मुतरिबा
तरबफज़ा, अलमरुबा
असर सदा-ए-साज का
जिगर में आग दे लगा

हर एक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया

पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मै जवान हू
                                                   - हफ़ीज़ जालंधरी
मायने
तरन्नुम=संगीत, सुबू=सुराही, सिम्त=और, समा=समय, उफक=क्षितिज, अयाँ=प्रकट, हुजुमे-मैकशा=मद्यपो का समूह, सु-ए-मैकदा रवा=मधुशाला की और जा रहा हू, नातुवा=दुर्बल, ख्याले-जुहद=इन्द्रियनिग्रह का विचार, कशुदो-बस्त=खोलने बंधने, बुद=संभावना, हस्त=अस्तित्व, वादा-ए-असस्त=आदिकाल का प्रण, हमा=सभी कुछ, बजुज़=सिवाय, कदह=प्याला, नशिस्त=महफ़िल, मुतरिबा=गायिका, तरबफज़ा=आनंदवर्धक, अलमरुबा=शौक को उड़ा देने वाला, सदा-ए-साज=साज की आवाज
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मुझ में कोई चीख उठता है, नहीं ऐसा नहीं - खुर्शीद रिज़वी

जब कभी मै खुद को समझाऊ कि तू मेरा नहीं
मुझ में कोई चीख उठता है, नहीं ऐसा नहीं

कब निकलता है कोई, दिल में उतर जाने के बाद
इस गली के दूसरी जानिब कोई रास्ता नहीं

तुम समझते हो बिछड़ जाने से मिट जाता है इश्क
तुम को इस दरिया कि गहराई का अंदाजा नहीं

तू तरशूंगा ग़ज़ल में तेरे पैकर के नुकूश
वो भी देखेगा तुझे जिसने तुझे देखा नहीं

उनसे मिलकर भी कहा मिटता है दिल का इज्तिराब
इश्क कि दिवार के दोनों तरफ साया नहीं
                                        - खुर्शीद रिज़वी
मायने
पैकर=आकृति, नुकूश=उभरे हुए चिन्ह, इज्तिराब=व्याकुलता
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बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया - हमीद जालंधरी

आ के वो मुझ खस्ता-जा पर यु करम फरमा गया
कोई दम बैठा, दिले नाशाद को बहला गया

कौन ला सकता है ताब उसके रूखे-पुरनूर कि
जिस तरफ से हो के गुजरा, बर्क सी लहरा गया

आख भर देखना कुछ खता ऐसी न थी
क्या खबर क्यों उनको मुझ पर इतना गुस्सा आ गया

फिर गई एक और ही दुनिया नजर के सामने
बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया

यु तो हम ने भी उसे देखा है लेकिन ए हमीद
जाने तुझ को कौन सा अंदाज उसका भा गया
                                                  - हमीद जालंधरी
मायने 
खस्ता-जा=कमजोर, दिले-नाशाद=दुखी दिल, ताब=ताकत, रूखे-पुरनूर=तेजस्वी मुख, बर्क=बिजली
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बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया - हमीद जालंधरी

आ के वो मुझ खस्ता-जा पर यु करम फरमा गया
कोई दम बैठा, दिले नाशाद को बहला गया

कौन ला सकता है ताब उसके रूखे-पुरनूर कि
जिस तरफ से हो के गुजरा, बर्क सी लहरा गया

आख भर देखना कुछ खता ऐसी न थी
क्या खबर क्यों उनको मुझ पर इतना गुस्सा आ गया

फिर गई एक और ही दुनिया नजर के सामने
बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया

यु तो हम ने भी उसे देखा है लेकिन ए हमीद
जाने तुझ को कौन सा अंदाज उसका भा गया
                                                  - हमीद जालंधरी
मायने 
खस्ता-जा=कमजोर, दिले-नाशाद=दुखी दिल, ताब=ताकत, रूखे-पुरनूर=तेजस्वी मुख, बर्क=बिजली
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मुझ में कोई चीख उठता है, नहीं ऐसा नहीं - खुर्शीद रिज़वी

जब कभी मै खुद को समझाऊ कि तू मेरा नहीं
मुझ में कोई चीख उठता है, नहीं ऐसा नहीं

कब निकलता है कोई, दिल में उतर जाने के बाद
इस गली के दूसरी जानिब कोई रास्ता नहीं

तुम समझते हो बिछड़ जाने से मिट जाता है इश्क
तुम को इस दरिया कि गहराई का अंदाजा नहीं

तू तरशूंगा ग़ज़ल में तेरे पैकर के नुकूश
वो भी देखेगा तुझे जिसने तुझे देखा नहीं

उनसे मिलकर भी कहा मिटता है दिल का इज्तिराब
इश्क कि दिवार के दोनों तरफ साया नहीं
                                        - खुर्शीद रिज़वी
मायने
पैकर=आकृति, नुकूश=उभरे हुए चिन्ह, इज्तिराब=व्याकुलता
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ये जिन्दगी आज जो तुम्हारे - निदा फ़ाज़ली

ये जिन्दगी आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में मचल रही है
तुम्हारे पैरो से चल रही है
तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है
तुम्हारे लफ्जो में ढल रही है
ये जिन्दगी न जाने कितनी सदियों से
यु ही शक्ले बदल रही है
बदलती शक्लो, बदलते जिस्मो में
चलता-फिरता ये एक शरारा
जो इस घडी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नजारा
सितारे तोड़ो या घर बसो
कलम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
                     - निदा फ़ाज़ली
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बहते आसू सबने देखे, दर्द न कोई जान सका - नसीम अजमेरी

आँखों से जो दूर थे पहले, दिल से भी अब दूर हुए
वार तेरे  तो गर्दिशे-दौरा, जब भी हुए भरपूर हुए

लौट गई यु खुशिया आकार, जैसे देखा कोई ख्वाब
उम्मीदों के शीश-महल क्या, रोज बने और चूर हुए

बहते आसू सबने देखे, दर्द न कोई जान सका
हो के रही गुमनाम हकीकत, अफसाने मशहूर हुए

दिल को तसल्ली देते-देते आखिर उम्र तमाम हुई
रंजो-अलम अब दूर हुए, अब दूर हुए, अब दूर हुए

फितरत ही आजाद हो जिसकी, कैद करे है किसकी मजाल
बहरे-मुहब्बत लाख मुरतब आइनों-दस्तूर हुए
                                   - नसीम अजमेरी
मायने
गर्दिशे-दौरा=ज़माने के उतार-चढाव, रंजो-अलम=दुख दर्द, फितरत=प्रकृति, बहरे-मुहब्बत=मुहब्बत के लिए, मुरताब=संग्रह करना, आइनों-दस्तूर=कानून कायदे
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ये जिन्दगी आज जो तुम्हारे - निदा फ़ाज़ली

ये जिन्दगी आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में मचल रही है
तुम्हारे पैरो से चल रही है
तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है
तुम्हारे लफ्जो में ढल रही है
ये जिन्दगी न जाने कितनी सदियों से
यु ही शक्ले बदल रही है
बदलती शक्लो, बदलते जिस्मो में
चलता-फिरता ये एक शरारा
जो इस घडी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नजारा
सितारे तोड़ो या घर बसो
कलम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
                     - निदा फ़ाज़ली
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बहते आसू सबने देखे, दर्द न कोई जान सका - नसीम अजमेरी

आँखों से जो दूर थे पहले, दिल से भी अब दूर हुए
वार तेरे  तो गर्दिशे-दौरा, जब भी हुए भरपूर हुए

लौट गई यु खुशिया आकार, जैसे देखा कोई ख्वाब
उम्मीदों के शीश-महल क्या, रोज बने और चूर हुए

बहते आसू सबने देखे, दर्द न कोई जान सका
हो के रही गुमनाम हकीकत, अफसाने मशहूर हुए

दिल को तसल्ली देते-देते आखिर उम्र तमाम हुई
रंजो-अलम अब दूर हुए, अब दूर हुए, अब दूर हुए

फितरत ही आजाद हो जिसकी, कैद करे है किसकी मजाल
बहरे-मुहब्बत लाख मुरतब आइनों-दस्तूर हुए
                                   - नसीम अजमेरी
मायने
गर्दिशे-दौरा=ज़माने के उतार-चढाव, रंजो-अलम=दुख दर्द, फितरत=प्रकृति, बहरे-मुहब्बत=मुहब्बत के लिए, मुरताब=संग्रह करना, आइनों-दस्तूर=कानून कायदे
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रातो को दिन बनाए जमाने गुजर गए - खुमार बारंबकवी

पी-पी के जगमगाए ज़माने गुजर गए
रातो को दिन बनाए जमाने गुजर गए

ए मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुजर गए
आजा के जहर खाए ज़माने गुजर गए

ओ जाने वाले आके तेरे इंतजार में
रास्तो को घर बनाए ज़माने गुजर गए

ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सबसे निजत पे ज़माने गुजर गए

क्या लायके सितम भी नहीं अब मै दोस्तों
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुजर गए

जाने बहार फूल नहीं आदमी हू मै
आ जा की मुस्कुराए ज़माने गुजर गए

क्या-क्या तवाक्कुआत थी आहो में ए खुमार
ये तीर भी चलाए ज़माने गुजर गए
                            -ख़ुमार बारांबकवी
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रातो को दिन बनाए जमाने गुजर गए - खुमार बारंबकवी

पी-पी के जगमगाए ज़माने गुजर गए
रातो को दिन बनाए जमाने गुजर गए

ए मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुजर गए
आजा के जहर खाए ज़माने गुजर गए

ओ जाने वाले आके तेरे इंतजार में
रास्तो को घर बनाए ज़माने गुजर गए

ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सबसे निजत पे ज़माने गुजर गए

क्या लायके सितम भी नहीं अब मै दोस्तों
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुजर गए

जाने बहार फूल नहीं आदमी हू मै
आ जा की मुस्कुराए ज़माने गुजर गए

क्या-क्या तवाक्कुआत थी आहो में ए खुमार
ये तीर भी चलाए ज़माने गुजर गए
                            -ख़ुमार बारांबकवी
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साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी- परवीन शाकिर

रस्ता भी कठिन, धुप में शिद्दत भी बहुत थी
साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी
 
खेमे न कोई मेरे मुसाफ़िर के जलाए
जख्मी था बहुत पाँव, मुसाफत भी बहुत थी

सब दोस्त मेरे मुंतजिरे-पर्दा-ए-शब् थे
दिन में तो सफ़र करने में दिक्कत भी बहुत थी

कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आए
और कुछ मेरी मिटटी में बगावत भी बहुत थी

इस तर्के-रिफाकत पे परीशां तो हू लेकिन
अब तक तेरे साथ पे हैरत भी बहुत थी

खुश आए तुझे शहरे-मुनाफ़िक़ की अमीरी
हम लोगो को सच कहने की आदत भी बहुत थी
                                         - परवीन शाकिर
मायने 
खेमा=तम्बू, मुसाफत=दुरी, मुंतजीरे-पर्दा-ए-शब्=रात होने के इंतजार में, तर्के-रिफाक़त=साथ छोड़ना, खुश आना=शुभ होना, शहरे-मुनाफ़िक़=ऐसा शहर जिसके लोग ऊपर से कुछ हो और अन्दर से कुछ, अमीरी=शासन

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साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी- परवीन शाकिर

रस्ता भी कठिन, धुप में शिद्दत भी बहुत थी
साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी
 
खेमे न कोई मेरे मुसाफ़िर के जलाए
जख्मी था बहुत पाँव, मुसाफत भी बहुत थी

सब दोस्त मेरे मुंतजिरे-पर्दा-ए-शब् थे
दिन में तो सफ़र करने में दिक्कत भी बहुत थी

कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आए
और कुछ मेरी मिटटी में बगावत भी बहुत थी

इस तर्के-रिफाकत पे परीशां तो हू लेकिन
अब तक तेरे साथ पे हैरत भी बहुत थी

खुश आए तुझे शहरे-मुनाफ़िक़ की अमीरी
हम लोगो को सच कहने की आदत भी बहुत थी
                                         - परवीन शाकिर
मायने 
खेमा=तम्बू, मुसाफत=दुरी, मुंतजीरे-पर्दा-ए-शब्=रात होने के इंतजार में, तर्के-रिफाक़त=साथ छोड़ना, खुश आना=शुभ होना, शहरे-मुनाफ़िक़=ऐसा शहर जिसके लोग ऊपर से कुछ हो और अन्दर से कुछ, अमीरी=शासन

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ए फलक चाहिए जी भर के नजारा हमको - दाग देहलवी

ए फलक चाहिए जी भर के नजारा हमको
जा के आना नहीं दुनिया में दोबारा हमको

हम किसी जुल्फे-परेशा की तरह ए तक़दीर
खूब बिगड़े थे मगर खूब सवारा हमको

शुक्र सद शुक्र की अब कब्र में हम जा पहुचे
तौसने-उम्र ने मंजिल पे उतारा हमको

बदसलूकी में मजा क्या है, मजा है इसमें
की हमारा हो तुम्हे पास, तुम्हारा हमको

बहरे-हस्ती में हुए कश्ती-ए-तुफा हम तो
नहीं मिलता है कही 'दाग' किनारा हमको
                                        - दाग देहलवी
मायने
फलक=आसमाँ, जुल्फे-परेशा=उलझी हुई जुल्फ (मुकद्दर का ख़राब होना), सद शुक्र=सौ बार शुक्र, तौसने उम्र=उम्र का घोडा, पास=ख्याल, लिहाज, बहरे-हस्ती=जीवन साग़र, कश्ती-ए-तुफा=मझधार में घिरी नाव

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ए फलक चाहिए जी भर के नजारा हमको - दाग देहलवी

ए फलक चाहिए जी भर के नजारा हमको
जा के आना नहीं दुनिया में दोबारा हमको

हम किसी जुल्फे-परेशा की तरह ए तक़दीर
खूब बिगड़े थे मगर खूब सवारा हमको

शुक्र सद शुक्र की अब कब्र में हम जा पहुचे
तौसने-उम्र ने मंजिल पे उतारा हमको

बदसलूकी में मजा क्या है, मजा है इसमें
की हमारा हो तुम्हे पास, तुम्हारा हमको

बहरे-हस्ती में हुए कश्ती-ए-तुफा हम तो
नहीं मिलता है कही 'दाग' किनारा हमको
                                        - दाग देहलवी
मायने
फलक=आसमाँ, जुल्फे-परेशा=उलझी हुई जुल्फ (मुकद्दर का ख़राब होना), सद शुक्र=सौ बार शुक्र, तौसने उम्र=उम्र का घोडा, पास=ख्याल, लिहाज, बहरे-हस्ती=जीवन साग़र, कश्ती-ए-तुफा=मझधार में घिरी नाव

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लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना - अशोक मिज़ाज

ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है
अब मेरे सर पे भी कुछ रंगे कफ़न आया है

उम्र मर-मर के गुजारी है, अभी तक हमने
अब कहा कही जा के हमें जीने का फन आया है

लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना
कैसी तहजीब है ये, कैसा चलन आया है

ऐसा लगता है कि मै तुझसे बिछड़ जाऊँगा
तेरी आँखों में भी सोने का हिरन आया है

यु तो दुनिया तेरी अच्छी है, बहुत अच्छी है
एक ही शख्स है, जिस शख्स पे मन आया है
                                             - अशोक मिज़ाज 
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लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना - अशोक मिज़ाज

ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है
अब मेरे सर पे भी कुछ रंगे कफ़न आया है

उम्र मर-मर के गुजारी है, अभी तक हमने
अब कहा कही जा के हमें जीने का फन आया है

लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना
कैसी तहजीब है ये, कैसा चलन आया है

ऐसा लगता है कि मै तुझसे बिछड़ जाऊँगा
तेरी आँखों में भी सोने का हिरन आया है

यु तो दुनिया तेरी अच्छी है, बहुत अच्छी है
एक ही शख्स है, जिस शख्स पे मन आया है
                                             - अशोक मिज़ाज 
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मत परेशा करो बहारो को - सरदार अंजुम

दे के आवाज़ ग़म के मारो को
मत परेशा करो बहारो को

इनसे शायद मिले सुरागे-हयात
आओ सजदा करे मजारो को

वो खिज़ा से है आज शर्मिंदा
जिसने रुसवा किया बहारो को

दिलकशी देख कर, तलातुम की
हमने देखा नहीं किनारों को

हम खिज़ा से गले मिले 'अंजुम'
लोग रोते रहे बहारो को
                          - सरदार अंजुम
मायने 
हयात=जिन्दगी, तलातुम=तूफान, खिज़ा=पतझड़
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मत परेशा करो बहारो को - सरदार अंजुम

दे के आवाज़ ग़म के मारो को
मत परेशा करो बहारो को

इनसे शायद मिले सुरागे-हयात
आओ सजदा करे मजारो को

वो खिज़ा से है आज शर्मिंदा
जिसने रुसवा किया बहारो को

दिलकशी देख कर, तलातुम की
हमने देखा नहीं किनारों को

हम खिज़ा से गले मिले 'अंजुम'
लोग रोते रहे बहारो को
                          - सरदार अंजुम
मायने 
हयात=जिन्दगी, तलातुम=तूफान, खिज़ा=पतझड़
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आईना टूट गया तेरी नजर होने तक - कृष्ण बिहारी नूर

धुन ये है आम तेरी रहगुज़र होने तक
हम गुजार जाए ज़माने को खबर होने तक

मुझको अपना जो बनाया है, तो एक और करम
बेखबर कर दे ज़माने को खबर होने तक

अब मुहब्बत कि जगह दिल में गमे-दौरा है
आईना टूट गया तेरी नजर होने तक

जिन्दगी रात है, मै रात का अफसाना हू
आप से दूर ही रहना है, सहर होने तक

जिन्दगी के मिले आसार तो कुछ जिन्दा में
सर ही तक्रैये, दीवार में दर होने तक
                                        -कृष्ण बिहारी नूर
मायने
रहगुज़र=रास्ता, गमे-दौरा=दुनिया के दुख, ज़िंदा=बंदीगृह, जेलखाना
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ख़त है या बदलती रूत - निदा फ़ाज़ली

ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन
इठलाती हुई गलिया, शरमाते हुए आँगन

शीशे-सा धुला चौका, मौती से चुने बर्तन
खिलता हुआ एक चेहरा, हँसते हुए सौ दर्पण

सिमटी हुई चौखट पर, कुछ धुप गिलहरी सी
नींबू की क्यारी में, चाँदी के कई कंगन

बच्चो-सी हुमकती शब्, गेंदों से उलझते दिन
चेहरों-सी धुली खुशिया, बालो सी खुली उलझन

हर पेड़ कोई किस्सा, हर घर कोई अफसाना
हर रास्ता पहचाना, हर चेहरे पे अपनापन
                                      - निदा फ़ाज़ली  

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वो शहर, वो कूचा, वो मका याद रहेगा - इब्ने इंशा

उस शाम वो रुखसत का शमा याद रहेगा
वो शहर, वो कूचा, वो मका याद रहेगा

वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगा
वो दर्द कि उभरी थी उधर याद रहेगा

हां बज्मे-शबाना में हमाशौक जो उस दिन
हम थे तेरी जानिब निगरा याद रहेगा

कुछ मीर के अबियत थे, कुछ फैज़ के मिसरे
इक दर्द का था जिनमे बयाँ, याद रहेगा

हम भूल सके है, न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें, हां याद रहेगा
                              - इब्ने इंशा
मायने 
बज्मे-शबां=रात कि महफ़िल, हमाशौक=बड़े शौक से, निगरा=देखने वाले, अबियात=शेर, मिसरे=कविता कि लाइने
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ख़त है या बदलती रूत - निदा फ़ाज़ली

ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन
इठलाती हुई गलिया, शरमाते हुए आँगन

शीशे-सा धुला चौका, मौती से चुने बर्तन
खिलता हुआ एक चेहरा, हँसते हुए सौ दर्पण

सिमटी हुई चौखट पर, कुछ धुप गिलहरी सी
नींबू की क्यारी में, चाँदी के कई कंगन

बच्चो-सी हुमकती शब्, गेंदों से उलझते दिन
चेहरों-सी धुली खुशिया, बालो सी खुली उलझन

हर पेड़ कोई किस्सा, हर घर कोई अफसाना
हर रास्ता पहचाना, हर चेहरे पे अपनापन
                                      - निदा फ़ाज़ली  

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आईना टूट गया तेरी नजर होने तक - कृष्ण बिहारी नूर


धुन ये है आम तेरी राहगुज़र होने तक
हम गुज़र जाएँ ज़माने को ख़बर होने तक

चश्मे-नम पलकों पे रोशन रहें अश्कों के चिराग़
ज़ुल्मते-शब से गुज़रना है सहर होने तक

मुझको अपना जो बनाया है तो इक और करम
बेख़बर करदें ज़माने को ख़बर होने तक

मिल गईं चश्मे-तवज्जो में सभी ताबीरें
कितने ही ख़्वाब नज़र आये सहर होने तक

अब मुहब्बत की जगह दिल में ग़मे-दौराँ है
आइना टूट गया तेरी नज़र होने तक

ज़िंदगी रात है, मैं रात का अफ़साना हूँ
आपसे दूर ही रहना है सहर होने तक

मौत आ जाएगी अरमाँ जो निकल जाएगा
जी रहे हैं तेरी महफि़ल में गुज़र होने तक

ज़िंदगी के मिलें आसार तो कुछ ज़िंदाँ में
सर ही टकराइए दीवार में दर होने तक - कृष्ण बिहारी नूर
मायने
रहगुज़र=रास्ता, ग़मे-दौराँ=दुनिया के दुख, ज़िंदाँ=बंदीगृह, जेलखाना

जिसे तुने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा मिला नहीं - बशीर बद्र

सारे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर में गया नहीं
मै जनम जनम से उसी का हू, उसे आज तक ये पता नहीं

उसे पाक नजरो से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई फुल लाख करीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं

ये खुदा कि देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है
जिसे तुने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा मिला नहीं

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ करीबी अजीज है
उन्हें मेरी कोई खबर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं
                                                 - बशीर बद्र
बशीर बद्र कि पुस्तक 'आस' से

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कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी - मुनव्वर राणा

उम्मीद भी किरदार पर पूरी नहीं उतरी,
ये शब् दिल-ए-बीमार पर पूरी नहीं उतरी

क्या खौफ का मंजर था तेरे शहर में कल रात,
सच्चाई भी अखबार पर पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सबकुछ
कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी

मै दुनिया के मयार पर पूरा नहीं उतरा
दुनिया ,मेरे मयार पर पूरी नहीं उतरी
                                       - मुनव्वर राणा

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जिसे तुने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा मिला नहीं - बशीर बद्र

सारे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर में गया नहीं
मै जनम जनम से उसी का हू, उसे आज तक ये पता नहीं

उसे पाक नजरो से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई फुल लाख करीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं

ये खुदा कि देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है
जिसे तुने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा मिला नहीं

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ करीबी अजीज है
उन्हें मेरी कोई खबर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं
                                                 - बशीर बद्र
बशीर बद्र कि पुस्तक 'आस' से

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कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी - मुनव्वर राना

उम्मीद भी किरदार पर पूरी नहीं उतरी,
ये शब् दिल-ए-बीमार पर पूरी नहीं उतरी

क्या खौफ का मंजर था तेरे शहर में कल रात,
सच्चाई भी अखबार पर पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सबकुछ
कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी

मै दुनिया के मयार पर पूरा नहीं उतरा
दुनिया ,मेरे मयार पर पूरी नहीं उतरी
                                       - मुनव्वर राणा

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मेरे नसीब ने फिर कम मुझे सजाए न दी - अख्तर नज्मी

सदाए देनी थी जिसको, उसे सदाए न दी
मेरे नसीब ने फिर कम मुझे सजाए न दी

मिली है विरसे में मुझको कलंदराना रविश
मुझे कभी किसी दरवेश ने दुआए न दी

वो जहर देता तो सबकी नजर में आ जाता
तो यु किया कि मुझे वक़्त पर दवाए न दी

मै सोचता हू कि ऐसा हुआ तो कैसे हुआ
किया सलाम तो माँ ने मुझे दुआए न दी

उडी थी बात मगर दब-दबा गई नज्मी
शरीफ लोग थे, अफवाह को हवाए न दी
                                           - अख्तर नज्मी
मायने
सदाए=आवाजे, विरसा=विरासत, कलंदराना रविश=फकीराना तबियत, दरवेश=फकीर
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अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा - मंज़ूर हाशमी

अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा
कभी डुबोएगा मुझको कभी बचाएगा

तिलिस्मे-कोहे-निदा जब भी टूट जाएगा
तो कारवाने-सदा भी पलट जाएगा

खिंची रहेगी सरो पर अगर यह तलवारे
माता-ए-जीस्त का अहसास बढ़ता जाएगा

युही डुबोता रहा, कश्तिया अगर सैलाब
तो सतहे-आब पे चलना भी आ ही जाएगा

किवाड़ अपने इसी दर से खोलते ही नहीं
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा
                             - मंज़ूर हाशमी
मायने 
तलातुम=पानी के थपेड़े, लहरे,  तिलिस्म=जादू, कोहे-निदा=आवाज का काफिला, मते-जीस्त=जिन्दगी की पूंजी, सतहे-आब=पानी की सतह
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देखा है जब भी आईना महसूस यु हुआ - जाज़िब आफ़ाकी

आदत नहीं, करे जो शिकायत किसी से हम
करते जरुर वरना कभी आपही से हम

देखा है जब भी आईना महसूस यु हुआ
वाकिफ हुए है जैसे किसी अजनबी से हम

हम क्या है, क्या नहीं, अभी इसका पाता नहीं
वैसे दिखाई देते है एक आदमी से हम

पीछे से खेचता कोई दामन है बार-बार
शायद कुछ आगे बढ़ गए खुद आगही से हम

आगे अभी तो और नशेबो-फ़राज़ है
आसूदगी को ढूंढते क्यों है अभी से हम
                                          - जाज़िब आफ़ाकी
मायने
खुद-आगही=आत्मज्ञान, नशेबो-फ़राज़=उतर-चढाव, आसूदगी=संतोष
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अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा - मंज़ूर हाशमी

अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा
कभी डुबोएगा मुझको कभी बचाएगा

तिलिस्मे-कोहे-निदा जब भी टूट जाएगा
तो कारवाने-सदा भी पलट जाएगा

खिंची रहेगी सरो पर अगर यह तलवारे
माता-ए-जीस्त का अहसास बढ़ता जाएगा

युही डुबोता रहा, कश्तिया अगर सैलाब
तो सतहे-आब पे चलना भी आ ही जाएगा

किवाड़ अपने इसी दर से खोलते ही नहीं
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा
                             - मंज़ूर हाशमी
मायने 
तलातुम=पानी के थपेड़े, लहरे,  तिलिस्म=जादू, कोहे-निदा=आवाज का काफिला, मते-जीस्त=जिन्दगी की पूंजी, सतहे-आब=पानी की सतह
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वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है - बहादुर शाह जफ़र

जिधर आँख पड़ती है , तू रूबरू है
तेरा जलवा सब में है सब जाय तू है

मेरी चश्म में क्या है? तेरा तसव्वुर
मेरे दिल में क्या है? तेरी आरजू है

बदन में महक है तेरे यासमन की
तेरे जुल्फे-मुशकि में अंबर की बू है

सादा पर्दा-ए-साज की यह नहीं है
कोई परदे में कर रहा गुफ्तगू है

कोई छूटता है यह दामन से कातिल
शहीदे-मुहब्बत का आखिर लहू है

'जफ़र' आपको ढूंढ़ मत ढूंढ़ उसको
वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है
                                       - बहादुर शाह जफ़र
मायने 
जाय=जगह, चश्म=आँख, तसव्वुर=कल्पना, यासमन=चमेली, जुल्फे-मुशकि=खुशबूदार जुल्फे, अंबर=खुशबू, पर्दा-ए-साज=साज का पर्दा, जुस्तजू=तलाश, खोज

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देखा है जब भी आईना महसूस यु हुआ - जाज़िब आफ़ाकी

आदत नहीं, करे जो शिकायत किसी से हम
करते जरुर वरना कभी आपही से हम

देखा है जब भी आईना महसूस यु हुआ
वाकिफ हुए है जैसे किसी अजनबी से हम

हम क्या है, क्या नहीं, अभी इसका पाता नहीं
वैसे दिखाई देते है एक आदमी से हम

पीछे से खेचता कोई दामन है बार-बार
शायद कुछ आगे बढ़ गए खुद आगही से हम

आगे अभी तो और नशेबो-फ़राज़ है
आसूदगी को ढूंढते क्यों है अभी से हम
                                          - जाज़िब आफ़ाकी
मायने
खुद-आगही=आत्मज्ञान, नशेबो-फ़राज़=उतर-चढाव, आसूदगी=संतोष
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कोई दिन गर ज़िंदगानी और है

कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है

आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी और है

बारहा देखीं हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सर-गिराऩी और है

देके ख़त मुँह देखता है नामाबर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है

क़ातर-अ़अ़मार हैं अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है

हो चुकीं "ग़ालिब" बलाएं सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है
मायने
आतिश-ए-दोज़ख़=नरक की आग, सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी=निहित ग़म की गर्मी, मर्ग-ए-नागहानी=आकस्मिक मृत्यु


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वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है - बहादुर शाह जफ़र

जिधर आँख पड़ती है , तू रूबरू है
तेरा जलवा सब में है सब जाय तू है

मेरी चश्म में क्या है? तेरा तसव्वुर
मेरे दिल में क्या है? तेरी आरजू है

बदन में महक है तेरे यासमन की
तेरे जुल्फे-मुशकि में अंबर की बू है

सादा पर्दा-ए-साज की यह नहीं है
कोई परदे में कर रहा गुफ्तगू है

कोई छूटता है यह दामन से कातिल
शहीदे-मुहब्बत का आखिर लहू है

'जफ़र' आपको ढूंढ़ मत ढूंढ़ उसको
वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है
                                       - बहादुर शाह जफ़र
मायने 
जाय=जगह, चश्म=आँख, तसव्वुर=कल्पना, यासमन=चमेली, जुल्फे-मुशकि=खुशबूदार जुल्फे, अंबर=खुशबू, पर्दा-ए-साज=साज का पर्दा, जुस्तजू=तलाश, खोज

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भरी बरसात में जिस दम बादल घिर के आते है - जोश मलीहाबादी

भरी बरसात में जिस दम बादल घिर के आते है
बुझा कर चाँद के मशाल सियाह परचम उड़ाते है

मकाँ के बमों-दर बिजली की रौ में जबझलकते है
सुबुक बूंदों से दरवाजे के शीशे जब खनकते है

सितारे दफ़न हो जाते है जब आगोशे-जुल्मत में
लपक उठता है एक कोंदा-सा शाइर की फितरत में

कड़क से आख खुल जाती है जब कमसिन हसीनो की
झलक उठती है मौजे-बर्क से अफ़शा जबीनो की
                                            - जोश मलीहाबादी
मायने 
परचम=झंडा, बामो-दर=खिडकिय और दरवाजे, रौ=बहाव, सुबुक=हल्का, आगोशे-जुल्मत=अँधेरे की गोद में, मौजे-बर्क=बिजली की लहर
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तेरी गली तक तो हमने देखा - नासिर काज़मी

गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया, किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था, मुझे तो हैरां कर गया वो

न अब वो यादो का चढ़ता दरिया, न फुर्सतो की उदास बरखा
यु ही ज़रा सी कसक दिल में, जो जख्म गहरा था भर गया वो

बस एक मंजिल है बुलहविस की, हजार रास्ते अहले-दिल के
यही तो फर्क मुझमे-उसमे, गुजार गया मै, ठहर गया वो

शिकस्ता-पा राह में खड़ा हू, गए दिनों को बुला रहा हू
जो काफिला मेरा हमसफ़र था, मिसाले-गर्द-सफ़र गया वो

वो रात का बे-नवा मुसाफिर, वो तेरा शायर वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा, फिर न जाने किधर गया वो
                                                   - नासिर काज़मी
मायने
मानुस=परिचित, बुलहविस=लौलुप, अहले-दिल=दिल वाले, शिकस्ता-पा=अपाहिज, निसहाय, मिसाले-गुर्दे-सफ़र=रास्ते की धुल की तरह, बे-नवा=कमजोर, जिसकी कोई आवाज न हो
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भरी बरसात में जिस दम बादल घिर के आते है - जोश मलीहाबादी

भरी बरसात में जिस दम बादल घिर के आते है
बुझा कर चाँद के मशाल सियाह परचम उड़ाते है

मकाँ के बमों-दर बिजली की रौ में जबझलकते है
सुबुक बूंदों से दरवाजे के शीशे जब खनकते है

सितारे दफ़न हो जाते है जब आगोशे-जुल्मत में
लपक उठता है एक कोंदा-सा शाइर की फितरत में

कड़क से आख खुल जाती है जब कमसिन हसीनो की
झलक उठती है मौजे-बर्क से अफ़शा जबीनो की
                                            - जोश मलीहाबादी
मायने 
परचम=झंडा, बामो-दर=खिडकिय और दरवाजे, रौ=बहाव, सुबुक=हल्का, आगोशे-जुल्मत=अँधेरे की गोद में, मौजे-बर्क=बिजली की लहर
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