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तुम जमाना-आशना, तुमसे जमाना ना-आशना
और हम अपने लिए भी अजनबी, ना-आशना

रास्ते भर कि रिफाक़त भी बहुत है जानेमन
वरना मंजिल पर पहुच कर कौन किसका आशना

मुद्दते गुजरी इसी बस्ती में लेकिन अब तलक
लोग नावाकिफ, फ़ज़ा बेगाना, हम ना-आशना

हम भरे शहरो में भी तन्हा है जाने किस तरह
लोग वीराने में भी पैदा कर लेते है आशना

अपनी बर्बादी पे कितने खुश थे हम लेकिन फ़राज़
दोस्त दुश्मन का निकल आया है अपना आशना
                                                 - अहमद फ़राज़

मायने 
आशना=जान-पहचान वाला, जमाना-आशना=ज़माने को समझाने वाले, मौका परस्त, रिफाक़त=साथ

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नींद के पाँव पे पत्थर बन के आते है ख्वाब
जख्म देते है उन्हें और टूटते जाते है ख्वाब

आप चाहे तो हमारी पुतलियो से पूछ लों
हमने यादो की रुई से रात भर काते है ख्वाब

नर्म चेहरे और उन पर सख्त चोटों के निशान
सोचिए इनके सिवा अब और क्या पाते है ख्वाब

बंद सीपी में छुपे अनमोल मोती की तरह
अपने अन्दर की चमक खुद ढूंढ़ कर लाते है ख्वाब

नींद में चलने का इनको रोग है लेकिन कुवर
नींद के बाहर भी अक्सर मुझसे टकराते है ख्वाब
                                      - कुवर बैचैन
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बेवफा रास्ते बदलते है
हमसफ़र साथ चलते है

किसके आसू छिपे है फूलो में
चूमता हू तो होठ जलते है

उसकी आँखों को गौर से देखो
मंदिरों में चराग जलते है

दिल में रहकर नजर नहीं आते
ऐसे कांटे कहा निकलते है

एक दीवार वो भी शीशे की
दो बदन पास-पास जलते है

कांच के मोतियों के आसू के
सब खिलोने गजल में ढलते है
                        - बशीर बद्र
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कोई हसीन सा नुक्ता निकल देता है
अजीब शख्स है बातो में टाल देता है

अब और इससे ज्यादा जवाब क्या देगा
मेरे खुतूत वह दरिया में दाल देता है

हजार फासले होने के बावजूद हमें
बड़ा सुकून किसी का ख्याल देता है

अजब हुनर उसे आता है बेवफाई का
वह एक लम्हे को सदियों में ढाल देता है

जो मछलियों को सिखाता है तैरना निकहत
वही तो है, जो मछेरो को जाल देता है -नसीम निकहत
मायने
निकट=बिंदु, खुतूत=पत्र
Roman
koi haseen sa nukta nikal deta hai
ajeeb shakhs hai baato me tal deta hai

ab aur isse jyada jwab kya dega
mere khutut wah dariya me dal deta hai

hajaar fasle hone ke bawjud hame
bada sukun kisi ka khyal deta hai

ajab hunar use aata hai bewafai ka
wah ek lamhe ko sadiyo me dhaal deta hai

jo machhliyo ko sikhata hai tairna nikhat
wahi to hai, jo machhero ko jaal deta hai - Naseem Nikhat
क्यों किसी और को दुख-दर्द सुनाऊ अपने
अपनी आखो में भी मै जख्म छुपाऊ अपने

मै तो कायम हू तेरे ग़म की बदोलत वरना
यु बिखर जाऊ कि खुद हाथ न आऊ अपने

शेर लोगो को बहुत याद है औरो के लिए
तू मिले तो मै तुझे शेर सुनाऊ अपने

तेरे रास्ते का जो काँटा भी मयस्सर आए
मै उसे शौक से कालर पे सजाऊ अपने

सोचता हू की बुझा दू मै ये कमरे का दिया
अपने साए को भी क्यों साथ जगाऊ अपने - अनवर मसउद
अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है
रूह गंगा की, हिमालय का बदन आजाद है

खेतिया सोना उगाये, वादिया मोती लुटाये
आज गौतम की जमीं, तुलसी का बन आजाद है

मंदिरों में शंख बाजे, मस्जिदों में हो अजाँ
शेख का धर्म और दीन-ए-ब्रहमन आजाद है
                                         - साहिर लुधियानवी



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दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हू मै

खाक ऐसी जिन्दगी पे की पत्थर नहीं हू मै

क्यों गर्दिशे-मुदाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हू, प्याला-ओ-साग़र नहीं हू मै

यारब ! जमाना मुझको मिटाता है किसलिए
लोहे-जहा पे हर्फे-मुकरर  नहीं हू मै

हद चाहिए सजा में उकुबत के वास्ते
आखिर गुनहगार हू काफ़िर नहीं हू मै

किस वास्ते अजीज नहीं जानते मुझे ?
लालो -जमुरुर्दो जारो-गौहर नहीं हू मै

रखते हो तुम कदम मेरी आँखों से क्यों दरेग़
रुतबे में मेहर-ओ-माह से कमतर नहीं हू मै

करते हो मुझको मनअ-ए-कदम-बोस किसलिए
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हू मै ?

'ग़ालिब' वजीफाख्वार हो, दो शाह को दुआ
वो दिन गए की कहते थे नौकर नहीं हू मै

मायने
दायम=हमेशा, गर्दिशे-मुदाम=सदा का चक्कर, लोहे-जहा=संसार रूपी तख्ती, हर्फे-मुकरर=दुबारा लिखा गया अक्षर, फालतू, उकुबत=कष्ट, मेहर-ओ-माह=सूरज और चाँद, मनअ-ए-कदम-बोस=कदम चूमने से मना,
मिर्ज़ा ग़ालिब के लेखो से खुद को अपडेट रखने के लिए क्या आपने ब्लॉग को सब्सक्राइब किया अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के जरिये सब्सक्राइब कीजिये |


अब किसे चाहे किसे ढूंढा करे
वो भी आखिर मिल गया अब क्या करे

हलकी-हलकी बरिशे होती रहे
हम भी फूलो की तरह भीगा करे

आँख मुंद इस गुलाबी धुप में
देर तक बैठे सोचा करे

दिल, मुहब्बत, दीन, दुनिया, शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करे

घर नया, बर्तन नए, कपडे नए
इन पुराने कागजो का क्या करे
                                -  बशीर बद्र
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कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है
कभी पीने पिलाने मे ये शीशे टूट जाते है

हम इस धरती के वासी है अगर टूटे तो क्या ग़म है
फलक पर हमने देखा है सितारे टूट जाते है

बहुत कम लोग ऐसे है, जिन्हें रहजन मिले होंगे
ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है

वो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो गया जो हमसे कहता था
जो शीशे जैसे होते है वो एक दिन टूट जाते है

कदम रुकने नहीं देना, सफ़र में ऐसा होता है
नए छले उभरते है पुराने फूट जाते है
                                           - अशोक मिज़ाज
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बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत उची ईमारत हर घडी खतरे में रहती है

बहुत जी चाहता है कैद -ए-जा से हम निकल जाए
तुम्हारी याद भी मगर इसी मलबे में रहती है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मै अदा कर ही नहीं सकता
मै जब तक घर न पहुचु मेरी माँ सजदे में रहती है
                                                  - मुनव्वर राणा
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अभी तो मै जवान हू  !

हवा भी खुशगवार है गुलो पे भी निखार है
तरन्नुम हजार है बहार पुरबहार है

कहा चला है साक़िया 
इधर तो लौट इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या 
उठा सुबू, सुबू उठा

सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र समा तो देख बेखबर 

वो काली-काली बदलिया
उफक पे हो गई अया
वो एक हुजुमे-मैकशा
है सु-ए-मैकदा रवा

ये क्या गुमा है बदगुमा समझ न मुझको नातुवा

खयाले-जुहद अभी कहा
अभी तो मै जवान हू

न ग़म कशुदो-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बुद का न हस्त का न वादा-ए-असस्त का

उमीद और यास गुम 
हवास गुम कयास गुम
नज़र से आस-पास गुम
हमा, बजुज़ गिलास गुम

न मय में कुछ कमी रहे कदह से हमदमी रहे
नशिस्त ये ज़मी रहे यही हुमाहुमी रहे

वो राग छेड़ मुतरिबा
तरबफज़ा, अलमरुबा
असर सदा-ए-साज का
जिगर में आग दे लगा

हर एक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया

पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मै जवान हू
                                                   - हफ़ीज़ जालंधरी
मायने
तरन्नुम=संगीत, सुबू=सुराही, सिम्त=और, समा=समय, उफक=क्षितिज, अयाँ=प्रकट, हुजुमे-मैकशा=मद्यपो का समूह, सु-ए-मैकदा रवा=मधुशाला की और जा रहा हू, नातुवा=दुर्बल, ख्याले-जुहद=इन्द्रियनिग्रह का विचार, कशुदो-बस्त=खोलने बंधने, बुद=संभावना, हस्त=अस्तित्व, वादा-ए-असस्त=आदिकाल का प्रण, हमा=सभी कुछ, बजुज़=सिवाय, कदह=प्याला, नशिस्त=महफ़िल, मुतरिबा=गायिका, तरबफज़ा=आनंदवर्धक, अलमरुबा=शौक को उड़ा देने वाला, सदा-ए-साज=साज की आवाज
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जब कभी मै खुद को समझाऊ कि तू मेरा नहीं
मुझ में कोई चीख उठता है, नहीं ऐसा नहीं

कब निकलता है कोई, दिल में उतर जाने के बाद
इस गली के दूसरी जानिब कोई रास्ता नहीं

तुम समझते हो बिछड़ जाने से मिट जाता है इश्क
तुम को इस दरिया कि गहराई का अंदाजा नहीं

तू तरशूंगा ग़ज़ल में तेरे पैकर के नुकूश
वो भी देखेगा तुझे जिसने तुझे देखा नहीं

उनसे मिलकर भी कहा मिटता है दिल का इज्तिराब
इश्क कि दिवार के दोनों तरफ साया नहीं
                                        - खुर्शीद रिज़वी
मायने
पैकर=आकृति, नुकूश=उभरे हुए चिन्ह, इज्तिराब=व्याकुलता
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आ के वो मुझ खस्ता-जा पर यु करम फरमा गया
कोई दम बैठा, दिले नाशाद को बहला गया

कौन ला सकता है ताब उसके रूखे-पुरनूर कि
जिस तरफ से हो के गुजरा, बर्क सी लहरा गया

आख भर देखना कुछ खता ऐसी न थी
क्या खबर क्यों उनको मुझ पर इतना गुस्सा आ गया

फिर गई एक और ही दुनिया नजर के सामने
बैठे-बैठे क्या बताऊ, क्या मुझ को याद आ गया

यु तो हम ने भी उसे देखा है लेकिन ए हमीद
जाने तुझ को कौन सा अंदाज उसका भा गया
                                                  - हमीद जालंधरी
मायने 
खस्ता-जा=कमजोर, दिले-नाशाद=दुखी दिल, ताब=ताकत, रूखे-पुरनूर=तेजस्वी मुख, बर्क=बिजली
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ये जिन्दगी आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में मचल रही है
तुम्हारे पैरो से चल रही है
तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है
तुम्हारे लफ्जो में ढल रही है
ये जिन्दगी न जाने कितनी सदियों से
यु ही शक्ले बदल रही है
बदलती शक्लो, बदलते जिस्मो में
चलता-फिरता ये एक शरारा
जो इस घडी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नजारा
सितारे तोड़ो या घर बसो
कलम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रौशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
                     - निदा फ़ाज़ली
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आँखों से जो दूर थे पहले, दिल से भी अब दूर हुए
वार तेरे  तो गर्दिशे-दौरा, जब भी हुए भरपूर हुए

लौट गई यु खुशिया आकार, जैसे देखा कोई ख्वाब
उम्मीदों के शीश-महल क्या, रोज बने और चूर हुए

बहते आसू सबने देखे, दर्द न कोई जान सका
हो के रही गुमनाम हकीकत, अफसाने मशहूर हुए

दिल को तसल्ली देते-देते आखिर उम्र तमाम हुई
रंजो-अलम अब दूर हुए, अब दूर हुए, अब दूर हुए

फितरत ही आजाद हो जिसकी, कैद करे है किसकी मजाल
बहरे-मुहब्बत लाख मुरतब आइनों-दस्तूर हुए
                                   - नसीम अजमेरी
मायने
गर्दिशे-दौरा=ज़माने के उतार-चढाव, रंजो-अलम=दुख दर्द, फितरत=प्रकृति, बहरे-मुहब्बत=मुहब्बत के लिए, मुरताब=संग्रह करना, आइनों-दस्तूर=कानून कायदे
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पी-पी के जगमगाए ज़माने गुजर गए
रातो को दिन बनाए जमाने गुजर गए

ए मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुजर गए
आजा के जहर खाए ज़माने गुजर गए

ओ जाने वाले आके तेरे इंतजार में
रास्तो को घर बनाए ज़माने गुजर गए

ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सबसे निजत पे ज़माने गुजर गए

क्या लायके सितम भी नहीं अब मै दोस्तों
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुजर गए

जाने बहार फूल नहीं आदमी हू मै
आ जा की मुस्कुराए ज़माने गुजर गए

क्या-क्या तवाक्कुआत थी आहो में ए खुमार
ये तीर भी चलाए ज़माने गुजर गए
                            -ख़ुमार बारांबकवी
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रस्ता भी कठिन, धुप में शिद्दत भी बहुत थी
साए से मगर उसको मुहब्बत भी बहुत थी
 
खेमे न कोई मेरे मुसाफ़िर के जलाए
जख्मी था बहुत पाँव, मुसाफत भी बहुत थी

सब दोस्त मेरे मुंतजिरे-पर्दा-ए-शब् थे
दिन में तो सफ़र करने में दिक्कत भी बहुत थी

कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आए
और कुछ मेरी मिटटी में बगावत भी बहुत थी

इस तर्के-रिफाकत पे परीशां तो हू लेकिन
अब तक तेरे साथ पे हैरत भी बहुत थी

खुश आए तुझे शहरे-मुनाफ़िक़ की अमीरी
हम लोगो को सच कहने की आदत भी बहुत थी
                                         - परवीन शाकिर
मायने 
खेमा=तम्बू, मुसाफत=दुरी, मुंतजीरे-पर्दा-ए-शब्=रात होने के इंतजार में, तर्के-रिफाक़त=साथ छोड़ना, खुश आना=शुभ होना, शहरे-मुनाफ़िक़=ऐसा शहर जिसके लोग ऊपर से कुछ हो और अन्दर से कुछ, अमीरी=शासन

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ए फलक चाहिए जी भर के नजारा हमको
जा के आना नहीं दुनिया में दोबारा हमको

हम किसी जुल्फे-परेशा की तरह ए तक़दीर
खूब बिगड़े थे मगर खूब सवारा हमको

शुक्र सद शुक्र की अब कब्र में हम जा पहुचे
तौसने-उम्र ने मंजिल पे उतारा हमको

बदसलूकी में मजा क्या है, मजा है इसमें
की हमारा हो तुम्हे पास, तुम्हारा हमको

बहरे-हस्ती में हुए कश्ती-ए-तुफा हम तो
नहीं मिलता है कही 'दाग' किनारा हमको
                                        - दाग देहलवी
मायने
फलक=आसमाँ, जुल्फे-परेशा=उलझी हुई जुल्फ (मुकद्दर का ख़राब होना), सद शुक्र=सौ बार शुक्र, तौसने उम्र=उम्र का घोडा, पास=ख्याल, लिहाज, बहरे-हस्ती=जीवन साग़र, कश्ती-ए-तुफा=मझधार में घिरी नाव

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ऐसा लगता है कि ये उम्र पहन आया है
अब मेरे सर पे भी कुछ रंगे कफ़न आया है

उम्र मर-मर के गुजारी है, अभी तक हमने
अब कहा कही जा के हमें जीने का फन आया है

लोग क्यों चाहते है उम्र से भी कम दिखना
कैसी तहजीब है ये, कैसा चलन आया है

ऐसा लगता है कि मै तुझसे बिछड़ जाऊँगा
तेरी आँखों में भी सोने का हिरन आया है

यु तो दुनिया तेरी अच्छी है, बहुत अच्छी है
एक ही शख्स है, जिस शख्स पे मन आया है
                                             - अशोक मिज़ाज 
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दे के आवाज़ ग़म के मारो को
मत परेशा करो बहारो को

इनसे शायद मिले सुरागे-हयात
आओ सजदा करे मजारो को

वो खिज़ा से है आज शर्मिंदा
जिसने रुसवा किया बहारो को

दिलकशी देख कर, तलातुम की
हमने देखा नहीं किनारों को

हम खिज़ा से गले मिले 'अंजुम'
लोग रोते रहे बहारो को
                          - सरदार अंजुम
मायने 
हयात=जिन्दगी, तलातुम=तूफान, खिज़ा=पतझड़
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धुन ये है आम तेरी रहगुज़र होने तक
हम गुजार जाए ज़माने को खबर होने तक

मुझको अपना जो बनाया है, तो एक और करम
बेखबर कर दे ज़माने को खबर होने तक

अब मुहब्बत कि जगह दिल में गमे-दौरा है
आईना टूट गया तेरी नजर होने तक

जिन्दगी रात है, मै रात का अफसाना हू
आप से दूर ही रहना है, सहर होने तक

जिन्दगी के मिले आसार तो कुछ जिन्दा में
सर ही तक्रैये, दीवार में दर होने तक
                                        -कृष्ण बिहारी नूर
मायने
रहगुज़र=रास्ता, गमे-दौरा=दुनिया के दुख, ज़िंदा=बंदीगृह, जेलखाना
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ख़त है या बदलती रूत, या गीतों भरा सावन
इठलाती हुई गलिया, शरमाते हुए आँगन

शीशे-सा धुला चौका, मौती से चुने बर्तन
खिलता हुआ एक चेहरा, हँसते हुए सौ दर्पण

सिमटी हुई चौखट पर, कुछ धुप गिलहरी सी
नींबू की क्यारी में, चाँदी के कई कंगन

बच्चो-सी हुमकती शब्, गेंदों से उलझते दिन
चेहरों-सी धुली खुशिया, बालो सी खुली उलझन

हर पेड़ कोई किस्सा, हर घर कोई अफसाना
हर रास्ता पहचाना, हर चेहरे पे अपनापन
                                      - निदा फ़ाज़ली  

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उस शाम वो रुखसत का शमा याद रहेगा
वो शहर, वो कूचा, वो मका याद रहेगा

वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगा
वो दर्द कि उभरी थी उधर याद रहेगा

हां बज्मे-शबाना में हमाशौक जो उस दिन
हम थे तेरी जानिब निगरा याद रहेगा

कुछ मीर के अबियत थे, कुछ फैज़ के मिसरे
इक दर्द का था जिनमे बयाँ, याद रहेगा

हम भूल सके है, न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें, हां याद रहेगा
                              - इब्ने इंशा
मायने 
बज्मे-शबां=रात कि महफ़िल, हमाशौक=बड़े शौक से, निगरा=देखने वाले, अबियात=शेर, मिसरे=कविता कि लाइने
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सारे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर में गया नहीं
मै जनम जनम से उसी का हू, उसे आज तक ये पता नहीं

उसे पाक नजरो से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई फुल लाख करीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं

ये खुदा कि देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है
जिसे तुने चाहा वो मिल गया, जिसे मैंने चाहा मिला नहीं

इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ करीबी अजीज है
उन्हें मेरी कोई खबर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं
                                                 - बशीर बद्र
बशीर बद्र कि पुस्तक 'आस' से

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उम्मीद भी किरदार पर पूरी नहीं उतरी,
ये शब् दिल-ए-बीमार पर पूरी नहीं उतरी

क्या खौफ का मंजर था तेरे शहर में कल रात,
सच्चाई भी अखबार पर पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सबकुछ
कल धुप भी दिवार पर पूरी नहीं उतरी

मै दुनिया के मयार पर पूरा नहीं उतरा
दुनिया ,मेरे मयार पर पूरी नहीं उतरी
                                       - मुनव्वर राणा

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सदाए देनी थी जिसको, उसे सदाए न दी
मेरे नसीब ने फिर कम मुझे सजाए न दी

मिली है विरसे में मुझको कलंदराना रविश
मुझे कभी किसी दरवेश ने दुआए न दी

वो जहर देता तो सबकी नजर में आ जाता
तो यु किया कि मुझे वक़्त पर दवाए न दी

मै सोचता हू कि ऐसा हुआ तो कैसे हुआ
किया सलाम तो माँ ने मुझे दुआए न दी

उडी थी बात मगर दब-दबा गई नज्मी
शरीफ लोग थे, अफवाह को हवाए न दी
                                           - अख्तर नज्मी
मायने
सदाए=आवाजे, विरसा=विरासत, कलंदराना रविश=फकीराना तबियत, दरवेश=फकीर
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अभी यह खेल तलातुम बहुत दिखाएगा
कभी डुबोएगा मुझको कभी बचाएगा

तिलिस्मे-कोहे-निदा जब भी टूट जाएगा
तो कारवाने-सदा भी पलट जाएगा

खिंची रहेगी सरो पर अगर यह तलवारे
माता-ए-जीस्त का अहसास बढ़ता जाएगा

युही डुबोता रहा, कश्तिया अगर सैलाब
तो सतहे-आब पे चलना भी आ ही जाएगा

किवाड़ अपने इसी दर से खोलते ही नहीं
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा
                             - मंज़ूर हाशमी
मायने 
तलातुम=पानी के थपेड़े, लहरे,  तिलिस्म=जादू, कोहे-निदा=आवाज का काफिला, मते-जीस्त=जिन्दगी की पूंजी, सतहे-आब=पानी की सतह
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आदत नहीं, करे जो शिकायत किसी से हम
करते जरुर वरना कभी आपही से हम

देखा है जब भी आईना महसूस यु हुआ
वाकिफ हुए है जैसे किसी अजनबी से हम

हम क्या है, क्या नहीं, अभी इसका पाता नहीं
वैसे दिखाई देते है एक आदमी से हम

पीछे से खेचता कोई दामन है बार-बार
शायद कुछ आगे बढ़ गए खुद आगही से हम

आगे अभी तो और नशेबो-फ़राज़ है
आसूदगी को ढूंढते क्यों है अभी से हम
                                          - जाज़िब आफ़ाकी
मायने
खुद-आगही=आत्मज्ञान, नशेबो-फ़राज़=उतर-चढाव, आसूदगी=संतोष
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जिधर आँख पड़ती है , तू रूबरू है
तेरा जलवा सब में है सब जाय तू है

मेरी चश्म में क्या है? तेरा तसव्वुर
मेरे दिल में क्या है? तेरी आरजू है

बदन में महक है तेरे यासमन की
तेरे जुल्फे-मुशकि में अंबर की बू है

सादा पर्दा-ए-साज की यह नहीं है
कोई परदे में कर रहा गुफ्तगू है

कोई छूटता है यह दामन से कातिल
शहीदे-मुहब्बत का आखिर लहू है

'जफ़र' आपको ढूंढ़ मत ढूंढ़ उसको
वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है
                                       - बहादुर शाह जफ़र
मायने 
जाय=जगह, चश्म=आँख, तसव्वुर=कल्पना, यासमन=चमेली, जुल्फे-मुशकि=खुशबूदार जुल्फे, अंबर=खुशबू, पर्दा-ए-साज=साज का पर्दा, जुस्तजू=तलाश, खोज

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कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है

आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी और है

बारहा देखीं हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सर-गिराऩी और है

देके ख़त मुँह देखता है नामाबर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है

क़ातर-अ़अ़मार हैं अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है

हो चुकीं "ग़ालिब" बलाएं सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है
मायने
आतिश-ए-दोज़ख़=नरक की आग, सोज़-ए-ग़महा-ए-निहानी=निहित ग़म की गर्मी, मर्ग-ए-नागहानी=आकस्मिक मृत्यु


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भरी बरसात में जिस दम बादल घिर के आते है
बुझा कर चाँद के मशाल सियाह परचम उड़ाते है

मकाँ के बमों-दर बिजली की रौ में जबझलकते है
सुबुक बूंदों से दरवाजे के शीशे जब खनकते है

सितारे दफ़न हो जाते है जब आगोशे-जुल्मत में
लपक उठता है एक कोंदा-सा शाइर की फितरत में

कड़क से आख खुल जाती है जब कमसिन हसीनो की
झलक उठती है मौजे-बर्क से अफ़शा जबीनो की
                                            - जोश मलीहाबादी
मायने 
परचम=झंडा, बामो-दर=खिडकिय और दरवाजे, रौ=बहाव, सुबुक=हल्का, आगोशे-जुल्मत=अँधेरे की गोद में, मौजे-बर्क=बिजली की लहर
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गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया, किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था, मुझे तो हैरां कर गया वो

न अब वो यादो का चढ़ता दरिया, न फुर्सतो की उदास बरखा
यु ही ज़रा सी कसक दिल में, जो जख्म गहरा था भर गया वो

बस एक मंजिल है बुलहविस की, हजार रास्ते अहले-दिल के
यही तो फर्क मुझमे-उसमे, गुजार गया मै, ठहर गया वो

शिकस्ता-पा राह में खड़ा हू, गए दिनों को बुला रहा हू
जो काफिला मेरा हमसफ़र था, मिसाले-गर्द-सफ़र गया वो

वो रात का बे-नवा मुसाफिर, वो तेरा शायर वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा, फिर न जाने किधर गया वो
                                                   - नासिर काज़मी
मायने
मानुस=परिचित, बुलहविस=लौलुप, अहले-दिल=दिल वाले, शिकस्ता-पा=अपाहिज, निसहाय, मिसाले-गुर्दे-सफ़र=रास्ते की धुल की तरह, बे-नवा=कमजोर, जिसकी कोई आवाज न हो
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सबकी हालत एक है नादा
कौन है गमगी, कौन है शादाँ

उसका पाना है वह करिश्मा
सोच तो मुश्किल, देख तो आसा

बादाकशो को फिक्र है जिसकी
बादा न सागर, बर्क न बारां

दुनिया को दुनिया करना है
ये मनसूबे, साज न सामां

ढूंढ़ ले मुझको दुनिया-दुनिया
सहारा-सहरा, जिन्दा-जिन्दा

उम्र 'फ़िराक' ने युही बसर की
कुछ गेम जाना, कुछ गमे दौरा
                           - फ़िराक गोरखपुरी
मायने
शादाँ=खुश, बादाकश=शराब पीने वाले, साग़र=जाम, बर्क=बिजली, बारां=बारिश, सहारा=रेगिस्तान, जिन्दा=कैदखाना

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परवाज में कुछ है, कोई पर तोल रहे है,
उड़ जायेंगे पंछी जो यहाँ बोल रहे है |

करते है तुझे याद, जो ले-ले के तेरा नाम,
हमराज़ ही सब राज़ तेरा खोल रहे है |

साथी तो पहुच भी गए मंजिल पे कभी के,
हम है कि अभी शाख पे पर तोल रहे है |

खिल-खिल के कहा गुंचो ने रोज़ चमन में,
हम उम्दा-ए-हस्ती कि गिरह खोल रहे है |

ये अहद था फिर उनसे न बोलेंगे कभी हम,
मजबूर है इस दिल से मगर बोल रहे है |
                                             - बिस्मिल भरतपुरी

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शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया
मेरी दुनिया में बन्दे के खुदा होने का वक़्त आया

उन्हें देखा तो जाहिद ने कहा, ईमान की यह है
की अब इंसान की सिजदा रवा होने का वक़्त आया

तकल्लुम की ख़ामोशी कह रही है, हर्फे-मतलब से
की अश्क आमेज नजरो से अदा होने का वक़्त आया

खुदा जाने ये है औजे-यकीं या पस्ती-ए-हिम्मत
खुदा से कह रहा हू, नाखुदा होने का वक़्त आया

हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम यानि
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक़्त आया- पंडित हरिचंद अख्तर
मायने
जाहिद=कर्मकांडी, रवा=जायज, तकल्लुम=बातचीत, हर्फे-मतलब=मुद्दे की बात, अश्क-आमेज=आसू भरी, औजे-यकीं=विश्वास की पराकाष्ठा, पश्तो-ए-हिम्मत=हिम्मत की कमी

Roman
Shabab aaya kisi but par fida hine ka wakt aaya
meri duniya me bande ke khuda hone ka wakt aaya

unhe dekha to jahid ne kaha, imaan ki yah hai
ki ab insan ki sijda rawa hone ka wakt aaya

takllum ki khamoshi kah rahi hai harfe matlab se
ki ashq aamej najro se ada hone ka wakt aaya

khuda jane ye hai ouje-yaki ya pasti-e-himmat
khuda se kah raha hu, nakhuda hone ka wakt aaya

hame bhi aa pada hai dosto se kuch kaam yani
hamare dosto ke bewafa hone ka waqt aaya - Pandit Harichand Akhtar
नील गगन में तैर रहा है, उजला-उजला चाँद
किन आँखों से देखा जाए, चंचल चेहरे जैसा चाँद

मुन्नी की भोली बातो-सी चटकी तारो की कलियाँ
पप्पू की खामौशी शरारत-सा छुप-छुप कर उभरा चाँद

परदेसी सुनी आँखों में, शोले से लहराते है
भाभी की छेड़ो-से बादल, आप की चुटकी-सा चाँद

तुम भी लिखना, तुमने उस शब् कितनी बार पिया पानी
तुमने भी तो छज्जे ऊपर देखा होगा पूरा चाँद
                                              -निदा फ़ाज़ली
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शाम से रास्ता तकता होगा
चाँद खिड़की में अकेला होगा

धुप की शाख पे तन्हा-तन्हा
वो मोहब्बत का परिंदा होगा

नींद में डूबी महकती साँसे
ख्वाब में फुल सा चेहरा होगा

मुस्कुराता हुआ झिलमिल आसू
तेरी रहमत का फ़रिश्ता होगा
                                   - बशीर बद्र 
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जिक्र उस परी-वश का और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आखिर, था जो राजदा अपना

मै वो क्यों बहुत पीते बज्मे-गैर में, यारब
आज ही हुआ मंजूर उनको इन्तहा अपना

मंजर एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता काश की मकाँ अपना

दे वो जिस कदर जिल्लत, हम हसी में टालेंगे
बारे आशना निकला, उनका पासबां अपना

दर्दे-दिल लिखू कब तक, जाऊ उनको दिखला दू
उंगलिया फिगार अपनी, खम खुचकाँ अपना

घिसते-घिसते मिट जाता आपने अबस बदला
नंगे-सिजदा से मेरे संगे आस्ता अपना

ता करे न गम्माजी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में हमने हमजबा अपना

हम कहा के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना

मायने
परी-वश=सुन्दर पारी की तरह, राजदा=भेदी, मित्र, बज्मे-गैर=रकीब की महफ़िल, रकीब=प्रतिद्वंदी, अर्श=आसमान, जिल्लत=अपमान, आशना=जाना-पहचाना, पासबां=दरबान, फिगार=जख्मी, खामा=कलम, खुचका=खून में डूबा हुआ, अबस=व्यर्थ, नंगे सिजदा से=माथा टेकने से आपसे हुए दागो से, संगे-आस्ता=दहलीज़ का पत्थर, गम्माजी=चुगली, दाना=बुद्धिमान, यकता=माहिर, अद्वितीय


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बसके दुशवार है हर काम का आसां होना |
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना ||

गिरया चाहे है खराबे मेंरे काशाने की |
दरो-दिवार से टपके है बयाबां होना ||

वाए-दीवानगी-शौक की हर दम मुझको |
आप जाना उधर और आप ही हैरां होना ||

की मेरे क़त्ल के बाद उसने ज़फा से तौबा |
हाय उस जुदे-पशेमां का पशेमां होना ||

हैफ उस चार गिरह कपडे की किस्मत ग़ालिब |
जिसकी किस्मत में हो आशिक का गरेबा होना ||

मायने
गिरया=आर्तनाद, जुदे-पशेमां का पशेमा होना= शीघ्र लज्जित हो जाने वाले का लज्जित होना, हैफ=अफ़सोस, काशाने= छोटा सा घर

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ये मुमकिन है की मिल जाए तेरी खोई हुई चीज़े
करीने से सजाकर रख ज़रा बिखरी हुई चीजे

कभी यु भी हुआ है, हँसते-हँसते तोड़ दी हमने
हमें मालूम था जुडती नहीं टूटी हुई चीजे

ज़माने के लिए जो है बड़ी नायब और महँगी
हमारे दिल से है वो सबकी सब उतरी हुई चीजे

दिखाती है हमें मजबुरिया ऐसे भी दिन अक्सर
उठानी पड़ती है फिर से हमें फेंकी हुई चीजे

जो देखा आज का इन्सान और इंसान का ईमाँ
हमें याद आ गई बाज़ार में बिकती हुई चीजे
                                             - हस्तीमल हस्ती
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ये बात फ़कत हम समझे है या दीदा-ए-जाना जाने है
दीदार को इतना होश तो है, आईने को हैराँ जाने है

ए काश कोई खुद आ के कभी इस वहम को दिल से दूर करे
ये कुर्ब को मुश्किल समझे है, यो बौद को आसां जाने है

गुलशन के नज़ारे हस-हस कर उकसाते रहे गुलचीनी पर
आदाबे-चमन से नावाकिफ, तहरीके-गुलिस्ता जाने है

क्या हाल वो था जब अपने लिए एक खाले-रूखे-जेबा था बहुत
क्या आज ये दिल का आलम है, आफाक को जिन्दा जाने है

ए सर्द हवाओ के झोको तुम होश में उसको ला न सके
आगाजे-खिज़ा को 'आफ़ाकी' तमहीदे-बहारा जाने है
                                                       - जाज़िब आफ़ाकी
मायने
दीद-ए-जाना=प्रियतम की आँख, दीदार=दर्शन, कुर्ब=सामीप्य, बौद=दुरी, गुलचीनी=फुल तोडना, तहरीके-गुलिस्ता=बाग़ की प्रेरणा, खाले-रूखे-जेबा=सुन्दर मुख का तिल, आफाक=क्षितिज, ज़िंदा=कारागार, आगाजे-खिज़ा=पतझड़ की शुरुआत, तमहीदे -बहारा=वसंत के आगमन का संकेत

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सितमगर तुझसे हम कब शिकवा-ए-बेदाद करते है
हमें फरियाद की आदत है, हम फरियाद करते है

हवाओ ! एक पल के वास्ते लिल्लाह रुक जाओ
वो मेरी अर्ज़ पर धीमे से कुछ इरशाद करते है

किया होगा कभी आदम को सिजदा कहने-सुनने से
फ़रिश्ते अब कहा परवा-ए-आदमजाद करते है

हमें ए दोस्तों ! चुपचाप मर जाना भी आता है
तड़प कर एक ज़रा दिलजोई ए सैयाद करते है

बहुत सादा-सा है कैफ अपने ग़म का अफसाना
वो हमको भूल बैठे है, जिन्हें हम याद करते है
                                     - सरस्वती सरन कैफ़
मायने
सितमगर=जुल्म करने वाला, शिकवा-ए-बेदाद=जुल्म की शिकायत, अर्ज़=विनती, इरशाद=फरमाना, आदम=पैगम्बर हजरत आदम, आदमजाद=इंसान, दिलजोई=दिल बहलाना, सैयाद=शिकारी
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मौत की वीरानियो में जिन्दगी बनकर रहा
वो खुदाओ के शहर में आदमी बनकर रहा

जिन्दगी से दोस्ती का ये सिला उसको मिला
जिन्दगी भर दोस्तों में अजनबी बनकर रहा

उसकी दुनिया का अँधेरा सोचकर तो देखिये
वो जो अन्धो की गली में रौशनी बनकर रहा

सनसनी के सौदेबजो से लड़ा जो उम्रभर
हश्र ये खुद एक दिन वो सनसनी बनकर रहा

एक अंधी दोड की अगुवाई को बैचैन सब
जब तलक बिनाई थी मै आखिरी बनकर रहा
                                                -संजय ग्रोवर 
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थी अपनी हद में धुल, अभी कल की बात है
राहों के थे उसूल, अभी कल की बात है

काफी थी एक ठेस बिखरने के वास्ते
इंसान भी थे फुल, अभी कल की बात है

उम्रो का वो लिहाज़ की बरगद की राह में
आते न थे बाबुल, अभी कल की बात है

दोनों ही एक दाल के पंछी की तरह थे
ये राम वो रसूल, अभी कल की बात है

आती थी बात जब भी वतन के बकार की
क़ुरबानी थी क़ुबूल, अभी कल की बात है

अपनी तो खैर गिनती दीवानों ही में रही
करते थे तुम भी भूल, अभी कल की बात है
                                     - हस्तीमल हस्ती
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कटी-फटी हुई तहरीर ले के आया था
अजब नविश्ता-ए-तक़दीर ले के आया था

थकन से चूर परिंदा न जाने किसके लिए
लहू में डूबा तीर ले के आया था

तमाम शहर को जड़ से उखाड़ फेका था
अजीब जज्बा-ए-तामीर ले के आया था

मै बेगुनाह था लेकिन मै इसका क्या करता
गुनहगार की तक़दीर ले के आया था

उसी पे बंद हुए रौशनी के दरवाजे
जो रंग-ए-नूर की जागीर ले के आया था

उधर से खुलती, इधर से लिपटती जाती थी
मै एक अजीब सी जंजीर ले के आया था
                                              - मज़ूर हाशमी
मायने
नविश्ता-ए-तक़दीर=तक़दीर का लिखा, जज्बा-ए-तामीर=निर्माण की भावना

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कितने मौसम सरगर्दा थे मुझसे हाथ मिलाने में
मैंने शायद देर लगा दी, खुद से बाहर आने में

बिस्तर से करवट का रिश्ता टूट गया एक याद के साथ
ख्वाब सिरहाने से उठ बैठा तकिये को सरकाने में

आज उस फुल की खुशबु मुझमे पैहम शोर मचाती है
जिसने बेहद उज्लत बरती खिलने और मुरझाने में

जितने दुख थे, जितनी उम्मीदे, सब से बराबर काम लिया
मैंने अपने आइन्दा की एक तस्वीर बनाने में

पहले दिल को आस दिला कर बेपरवा हो जाता था
अब तो अज्म बिखर जाता हू मै खुद को बहलाने में - अज्म बहजाद
मायने
सरगर्दा=परेशां, पैहम=लगातार
न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता
हमी से ये तमाशा है, न हम होते तो क्या होता

न ऐसी मंजिले होती, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम जेरे-पा होता

घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तजकिरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते की जख्मे-दिल हरा होता

बुला कर तुमने महफ़िल में हमें गैरो से उठवाया
हमी खुद उठ गये होते, इशारा कर दिया होता

तेरे अहबाब तुझसे मिल के फिर मायूस लौट गये
तुझे नौशाद कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता
                                            - नौशाद लखनवी
मायने
सनम=मूर्ति, आलम=दुनिया, जेरे-पा=कदमो में, तजकिरा=जिक्र, चर्चा, अहबाब=दोस्त
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अच्छा जो खफा हम से हो तुम ए सनम अच्छा
लों हम भी न बोलेंगे खुदा की कसम अच्छा

गमी ने कुछ आग और ही सीने में लगा दी
हर तौर गरज आप आप से मिलना है कम अच्छा

अगयार से करते हो मिरे सामने बाते
मुझ पर ये लगे करने तुम सितम अच्छा

कह कर गए, आता हू कोई दम में, मै तुम पास
फिर दे चले कल की सी तरह मुझ को दम अच्छा

इस हस्ती-ए-मौहूम से मै तंग हू 'इंशा'
वल्लाह की इस से बमरातिब अदम अच्छा- इंशा अल्लाह खाँ इंशा
मायने
अगयार=गैरो, हस्ती-ए-मौहूम=निस्सार जीवन, बमरातिब=अपेक्षाकृत, अदम=अपेक्षा
कौन कहता है मौत आई तो मर जाऊँगा
मै तो दरिया हू, समंदर में उतर जाऊँगा

तेरा दर छोड़ के मै और किधर जाऊंगा
घर में घिर जाऊँगा, सहरा में बिखर जाऊँगा

तेरे पहलु से उठूँगा तो मुश्किल यह है
सिर्फ एक शख्स को पाऊंगा जिधर जाऊँगा

अब तो खुर्शीद को डूबे हुए सदिया गुजरी
अब उसे ढूंढने में ता-ब-सहर जाऊँगा

जिन्दगी शमा की मानिंद जलाता हू नदीम
बुझ तो जाऊंगा मगर सुबह तो कर जाऊँगा
                                                - अहमद नदीम कासमी
मायने 
सहरा=रेगिस्तान, खुर्शीद=सूरज, ता-ब-सहर=सुबह तक, मानिंद=तरह

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सितम भी करता है, उसका सिला भी देता है
की मेरे हाल पे वह मुस्कुरा भी देता है

शिनावरो को उसी ने डुबो दिया शायद
जो डूबता को किनारे लगा भी देता है

यही सुकूत, यही दश्ते-जा का सन्नाटा
जो सुनना चाहे कोई तो सदा भी देता है

अजीब कूचा-ए-कातील की रस्म है की यह
जो क़त्ल करता है वह खूँ-बहा भी देता है

वह कौन है की ग़मों से नवाजता है मुझे
ग़मों को सहने का फिर हौसला भी देता है

मुझी से कोई छुपता है राजे-ग़म सरे-शाम
मुझी को आखिरे-शब फिर बता भी देता है
                                                 -मुश्फ़िक ख्वाज़ा
मायने
शिनावरो=तैराकों, सुकूत=स्तब्धता, दश्ते-जा=अंतर्मन का वन, कूचा-ए-कातील=वध करने वाली (प्रेयसी) की गली, खूँ-बहा=वह धन जो प्राणों के बदले हत्यारे द्वारा दिया जाए, सरे-शाम=सायंकाल, आखिरे-शब=रात्रि का आखिरी पहर
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न शाम है न सवेरा, अजब दयार में हू
मै एक अरसए बेरंग के हिसार में हू

सिपाहे गैर ने कब मुझको जख्म-जख्म किया
मै आप अपनी ही साँसों के कारज़ार में हू

कशा-कशा जिसे ले जाएँगे मकतल
मुझे खबर है की मै भी उसी कतार में हू

अता-पता किसी खुशबु से पूछ लों मेरा
यही-कही किसी मंजर, किसी बहार में हू

न जाने कौन से मौसम में फुल महकेंगे
न जाने कब से तेरी चश्मे-इन्तजार में हू

शरफ मिला है कहा तेरी हमरही का मुझे
तू शहसवार है और में तेरे गुबार में हू   - अतहर नफीस
मायने 
दयार=जगह, अरसए बेरंग=बेरंग समय,अजीब स्थिति, हिसार=घेरा, सिपाहे गैर=शत्रु सेना, कारज़ार=युद्धस्थल, कशा-कशा=धीरे-धीरे, मकतल=वधगृह के समीप, चश्मे-इन्तजार=इंतजार कर रही आँख, शरफ=सौभाग्य, हमरही=सहयात्रा, शहसवार=घुड़सवार, गुबार=घुल, मिटटी

Roman

n shaam hai n sawera, jab dayar me hu
mai ek arsae berang ke hisar me hu

sipahe gair ne kab mujhko jakhm-jakhm kiya
mai aap apni hi saanso ke karjar me hu

kasha-kasha jise le jayenge maktal
mujhe khabar hai ki mai bhi usi kataar mai hu

ata-pata kisi khushbu se puch lo mera
yahi-kahi kisi manjar, kisi bahaar me hu

n jaane koun se mousam me phool mahkenge
n jaane kab se teri chashme-intjar me hu

sharaf mila hai kaha teri hamrahi ka mujhe
tu shaharwar hai aur mai tere gubaar me hu - Athar Nafis
हमारा दिल तो मुकम्मल सुकून चाहता है
मगर ये वक्त की हमसे जूनून चाहता है

अब इस बहिश्त को मकतल का नाम दे दीजे
की अब ये खितए-कश्मीर, खून चाहता है

फरेब इतने दी है उसे सहारो ने
वो छत भी अपने लिए बेसुतून चाहता है

सफ़र में बर्फ हवाओ से नींद आती है
लहू हमारा दिसंबर में जून चाहता है

मिलेगा तुझको फ़कत सुहबते-बुजुर्गा से
अगर शऊरे-उलुमो-फुनून चाहता है
                                       - फ़ारुक़ अंजुम
मायने 
बहिश्त=जन्नत, स्वर्ग, मकतल=वधस्थल, खितए-कश्मीर=कश्मीर का इलाका, फरेब= धोखा, बेसुतून=बिना खम्बो का, शऊरे-उलुमो-फुनून =विधाओ, कलाओ की समझ
 
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प्यार को सदियों के, एक लम्हे की नफ़रत खा गई
इक इबादतगाह यह गन्दी सियासत खा गई

मुस्तक़िल फांको ने चेहरों की बशाशत छीन ली
फुल-से मासूम बच्चो को भी ग़ुरबत खा गई

ऐश कोशी बन गई वझे-जवाले-सल्तनत
बेहिसी कितने शहंशाहो की अज़मत खा गई

आज मैंने अपने ग़म का उस से शिकवा कर दिया
एक लगजिश जिन्दगी भर की इबादत खा गई

झुक के वह गैरो के आगे खुश तो लगता था मगर
उसकी खुद्दारी को खुद उसकी नदामत खा गई
                                                     - अनवर जलालपुरी
मायने
मुस्तक़िल फांके=लगातार भूखा रहना, बशाशत=खिला हुआ चेहरा, इन्सान, ग़ुरबत=गरीबी, ऐश कोशी=ऐश करने की आदत, वजहे-ज़वाले-सल्तनत=सल्तनत डूबने की वजह, बेहिसी=संवेदनहीनता, अज़मत=महानता, लगजिश=डगमगाना, नदामत=ग्लानी

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नाम आए तो सारा तन महके
जिक्र से तेरे अंजुमन महके

सरहदों पर तुम्हारे कदमो की
धुल उड़े और यह वतन महके

खौफ तुझको नहीं कांटो का
तेरे पैरो की हर चुभन महके

तू ज़माने में सर्बुलंद रहे
और मर जाए तो कफ़न महके

ए शहीदे-वतन क़यामत तक
तेरी मिटटी, तेरा कफ़न महके

जीत की जब सुने खबर अज़ीज़
उसका दिल झूमे, तन-बदन महके
                                    -अज़ीज़ अंसारी
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शायरे फितरत हू मै, जब फिक्र फरमाता हू मै
रूह बन कर जर्रे-जर्रे में समां जाता हू मै

आ की तुझ बिन इस तरह से दोस्त घबराता हू मै
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हू मै

जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं
और भी बेग़ाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं

जब मकान-ओ-लामकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं
अल्लाह-अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं

हाय रे मजबुरिया, तर्के मुहब्बत के लिए
मुझको समझते है वो और उनको समझाता हू मै

मेरी हिम्मत देखना, मेरी तबियत देखना
जो सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हू मै

हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है
अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं

तेरी महफ़िल, तेरे जलवे, फिर तकाजा क्या जरुर
ले उठा जाता हू जालिम, ले चला जाता हू मै

वाह रे शौके शहादत, कुए कातिल की तरफ
गुनगुनाता, रक्स करता, झूमता जाता हू मै

देखना उस इश्क़ की ये तुर्फ़ाकारी देखना
वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शर्माता हूँ मैं

एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिसे "ज़िगर"
एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं
                                                 - जिगर मुरादाबादी
मायने
शायरे फितरत=प्रकृति का शायर, फिक्र-चिंतन, जर्रे-जर्रे=कण-कण, शय=चीज़, तर्के मुहब्बत=मुहब्बत छोड़ना, शौके शहादत=शहादत की इच्छा, कुए कांतिल=कांतिल अर्थात प्रियतम की गली, रक्स=नृत्य


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हस के बोला करो, बुलाया करो
आप का घर है, आया जाया करो

मुस्कराहट है हुस्न का जेवर
रूप बढ़ता है, मुस्कुराया करो

हद से बढ़ कर हसीन लगते हो
झूठी कसमे जरुर खाया करो

हुक्म करना भी एक सख़ावत है
हमको खिदमत कोई बताया करो

बात करना भी बादशाहत है
बात करना न भूल जाया करो

ताकि दुनिया की दिलकशी न घाटे
नित-नए पैरहन में आया करो

कितने सदा मिजाज़ हो तुम अदम
उस गली में बहुत न जाया करो
                                - अब्दुल हमीद अदम
मायने
सख़ावत=दानशीलता, दिलकशी=खूबसूरती, पैरहन=लिबास

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ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं,
और क्या ज़ुर्म है पता ही नहीं.

इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं.

सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे,
झूठ की कोई इन्तेहा ही नहीं.

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं
                                -कृष्ण बिहारी नूर


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रूखो के चंद लबो के गुलाब मांगे है
बदन की प्यास बदन की शराब मांगे है

मै कितने लम्हे न जाने कहा गवा आया
तेरी निगाह तो सारा हिसाब मांगे है

मै किस से पूछने जाऊ की आज हर कोई
मेरे सवाल का मुझ से जवाब मांगे है

दिले तबाह का ये हौसला भी क्या कम है
हरेक दर्द से जीने की ताब मांगे है

जो इजतराब बजाहिर सुकून लगता है
हरेक शेर वही इजतराब मांगे है
                                    - जाँ निसार अख्तर
मायने
रुख=चेहरा, ताब=शक्ति, इज़तराब=व्याकुलता
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उठो और उठ के निजामे जहा बदल डालो
यह आशमा,यह ज़मी, यहाँ मकाँ बदल डालो

यह बिजलिया है पुरानी, यह बिजलिया फूको
यह आशिया है कदीम, आशिया बदल डालो

गुलो के रंग में आग, पंखुड़ी में शराब
कुछ इस तरह रविशे गुलसिता बदल डालो

निजामे काफिला बदला तो क्या कमाल किया
मिजाजे राह्बरे कारवा बदल डालो

हयात कोई कहानी नहीं हकीकत है
इस एक लफ्ज़ से कुल दस्ता बदल डालो
                                          - साग़र निज़ामी
मायने
निजामे-जहा=विश्व व्यवस्था, आशिया=घोसला, कदीम=पुराना, गुल=फुल, रविश=उद्यान के बीच का पथ, तरीका, राह्बरे कारवा=करवा का पथ पदर्शक, हयात=जीवन
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दुनिया में हूँ दूनिया का तलबगार नहीं हू
बाज़ार से गुज़ारा हू खरीदार नहीं हू

जिंदा हू मगर जीस्त की लज्जत नहीं बाकी
हर चंद की हू होश में होशियार नहीं हू

इस खाना-ए-हस्ती से गुजर जाऊँगा बे-लौस
साया हू फकत नक्श-ए-दीवार नहीं हू

अफसुर्दा हू इबारत से दवा की नहीं हाजत
ग़म का मुझे ये जौफ है बीमार नहीं हू

वो गुल हू खिजा ने जिसे बर्बाद किया है
उलझु किसी दामन से में वो खार नही हू

यारब मुझे महफूज रख उस बुत के सितम से
में उस की इनायत का तलबगार नहीं हू

अफ्सुर्दगी-ओ-जौर की कुछ हद नहीं अकबर
काफ़िर के मुकाबिल में भी दीनदार नहीं हू
                                                       - अकबर इलाहबादी
मायने

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छोड़ के मेरा घर वो, किस के घर जाएगा
दर्द को और न समझाओ, वो मर जाएगा

दानिश्वर ! ये तेरी खिरद का खेल नहीं
दिल ने जो भी करना है, वो कर जाएगा

इतना प्यार दिखा मत अपने दुश्मन से
दिलजला, किसी दिन तुझ पे मर जाएगा

प्यार बात के देखो, सारी दुनिया से
दिल का दामन भरते-भरते भर जाएगा

मौत सजा कर जिस दिन अपना रथ लाई
ये घर छोड़ के, अंजुम अपने घर जाएगा
                                   - सरदार अंजुम
मायने
दानिश्वर=बुध्हिजिव, खिरद=अक्ल बुद्धि

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