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आँखों में जल रहा है क्यों बुझता नहीं धुआँ
आँखों में जल रहा है क्यों बुझता नहीं धुआँ

आँखों में जल रहा है क्यों बुझता नहीं धुआँ उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ चूल्हा नहीं जलाए या बस्ती ही जल गई कुछ रोज हो गए है अब उठता...

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अदम गोंडवी और उनकी शायरी
अदम गोंडवी और उनकी शायरी

22 अक्टूम्बर 1947 को गोस्वामी तुलसीदास के गुरु स्थान सूकर क्षेत्र के करीब परसपुर (गोंडा) के आटा ग्राम में स्व. श्रीमती मांडवी सिंह एवं श्री ...

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नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने
नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने

नुकताची है गमे-दिल उसको सुनाए न बने क्या बने बात जहा बात बनाये न बने मै बुलाता तो हू उसको मगर ए जज्बा-ए-दिल उस पे बन जाए कुछ ऐसी की बिन आये ...

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धुप में निकलो घटाओ में नहाकर देखो -निदा फाजली
धुप में निकलो घटाओ में नहाकर देखो -निदा फाजली

धुप में निकलो घटाओ में नहाकर देखो जिंदगी क्या है किताबो को हटाकर देखो वो सितारा है चमकने दो यु ही आँखों में क्या जरुरी है उसे जिस्म बनाक...

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जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है - अख्तर शिरानी
जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है - अख्तर शिरानी

जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है, बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है। ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है, पर्दों में क्या छिपा...

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खुशी का मसअला क्या है जो मुझसे खौफ खाती है -अनवर जलालाबादी
खुशी का मसअला क्या है जो मुझसे खौफ खाती है -अनवर जलालाबादी

खुशी का मसअला क्या है जो मुझसे खौफ खाती है इसे जब भी बुलाता हू गमो को साथ लाती है चिरागों कब हवा की दोगली फितरत को समझोगे जलाती है यही त...

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कैसे कैसे हादसे सहते रहे - वाजिदा तबस्सुम
कैसे कैसे हादसे सहते रहे - वाजिदा तबस्सुम

कैसे कैसे हादसे सहते रहे, हम यूँही जीते रहे हँसते रहे उसके आ जाने की उम्मीदें लिए रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे वक्त तो गुजरा मगर कु...

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अपने आप को मरते हुए देख
अपने आप को मरते हुए देख

दिन इक के बाद एक गुजरते हुए देख इक दिन तो अपने आप को मरते हुए देख हर वक्त खिलते फुल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख...

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ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे

आईना क्यों न दू की तमाशा कहे जिसे ऐसा कहा से लाऊ की तुझ सा कहे जिसे हसरत ने ला रखा तेरी बज्मे-ख्याल में गुलदस्ता-ए-निगाह, सुवैदा कहे जिस...

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क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया - कृष्ण कुमार नाज़
क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया - कृष्ण कुमार नाज़

क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया हमको भी हालात के साँचे में ढलना आ गया रोशनी के वास्ते धागे को जलते देखकर ली नसीहत मोम ने उसको पिघलन...

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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता
मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता

मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता खुलुसे-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शऊरे-हुस्न को बेदा...

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मख़दूम की याद में-2 - फैज़ अहमद फैज़
मख़दूम की याद में-2 - फैज़ अहमद फैज़

मखदूम की याद में पहली कड़ी याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब सुब्‍ह फूटी तो वो पहलू से उ...

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जेहन-ए-आदमियत पर
जेहन-ए-आदमियत पर

जेहन-ए-आदमियत पर मस्लेहत के पहरे है लोग जितने मुख्लिस है, जख्म उतने गहरे है फुल है यहाँ कांटे, जिस्म है यहाँ पत्थर किस जहा के वासी है, क...

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बयान-ए-शहरयार - नौमान शौक
बयान-ए-शहरयार - नौमान शौक

शहरयार साहब को पिछले हफ्ते ज्ञान पीठ पुरस्कार मिला तो उनके बारे में लिखा गया नौमान शौक का पुराना लेख आपके लिये पेश है:- शहरयार का नाम ग़ज़ल ...

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ए नौजवाने-बेअमल- दिलावर फिगार
ए नौजवाने-बेअमल- दिलावर फिगार

ए नौजवाने-बेअमल, मायूस क्यों है आजकल सर्विस नहीं मिलती तुझे, सर्विस पे लानत भेज दे एम. ए. की डिग्री फाड दे, गर्दे-नहूसत झाड दे सर पर अंगोछा ...

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गर कलम न छीनी गई -नीरज
गर कलम न छीनी गई -नीरज

गर कलम न छीनी गई तो हिन्दुस्तान बदलकर छोडूँगा! इंसान है क्या मै दुनिया का भगवान बदलकर छोडूँगा!! मै देख रहा हू भूख उग रही है गलियों बाजारों म...

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पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना - गुलज़ार
पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना - गुलज़ार

मै जितनी भी जबाने जानता हू वो सारी आजमाई है खुदा ने एक भी समझी नहीं अब तक ना वो गर्दन हिलाता है, न हुंकार ही भरता है कुछ ऐसा सोचकर शाय...

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चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है - हसरत मोहानी
चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है - हसरत मोहानी

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है, हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है, बाहज़ारां इज़्तिराब-ओ-सदहज़ारां इश्तियाक, तुझसे वो पहले पहल दि...

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दाग दुनिया ने दिए- कैफ भोपाली
दाग दुनिया ने दिए- कैफ भोपाली

दाग दुनिया ने दिए, जख्म जमाने से मिले हमको तोहफे ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले हम तरसते ही, तरसते ही, तरसते ही रहे, वो फलाने से, फलाने...

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दरिया ने जब से - बेदिल हैदरी
दरिया ने जब से - बेदिल हैदरी

दरिया ने जब से चुप का लिबादा पहन लिया प्यासों ने अपने जिस्म पे सेहरा पहन लिया वो टाट की कबा थी या कागज था जो भी था जैसा भी मिल गया हमें ...

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आहट हमारी सुन के वो - तुर्फैल चर्तुवेदी
आहट हमारी सुन के वो - तुर्फैल चर्तुवेदी

आहट हमारी सुन के वो खिड़की में आ गये अब तो ग़ज़ल के शेर असीरी में आ गये साहिल पे दुश्मनों ने लगाई थी ऐसी आग हम बदहवास डूबती कश्ती में आ...

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धूप के साथ गया, साथ निभाने वाला - वजीर आगा
धूप के साथ गया, साथ निभाने वाला - वजीर आगा

धूप के साथ गया, साथ निभाने वाला अब कहां आएगा वो, लौट के आने वाला। रेत पर छोड़ गया, नक्श हजारों अपने किसी पागल की तरह, नक्श मिटाने वाला।...

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परिचय- डा. ज़रीना सानी
परिचय- डा. ज़रीना सानी

डा. ज़रीना सानी का जन्म 5, जुलाई, 1936 को नागपुर शहर (महाराष्ट्र) में हुआ था | आपके पिता अब्दुल रहीम (चक्कीवाले) एक प्रगतिशील विचारक थे | ...

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खुदा तो खैर मुस्लमा था
खुदा तो खैर मुस्लमा था

आज़ादी के समय के आसपास लिखे गये तीन शेरो के बारे में पढते है जिनके बारे में मशहूर शायर निदा फाज़ली लिख रहे है और विश्लेषण कर रहे है | जगन्ना...

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मिलेगी शेख को जन्नत हमें दौजख अता होगा
मिलेगी शेख को जन्नत हमें दौजख अता होगा

मिलेगी शेख को जन्नत हमें दौजख अता होगा बस इतनी बात है, जिसके लिए महशर बपा होगा रहे दोनों फ़रिश्ते साथ अब इन्साफ क्या होगा किसी ने कुछ लिख...

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अपने जीवन में सादगी रखना- चाँद शेरी
अपने जीवन में सादगी रखना- चाँद शेरी

अपने जीवन में सादगी रखना आदमियत की शान भी रखना बंद जेहनो के दर-दरीचो से तुम न उम्मीदे-रौशनी रखना डस न ले आस्तीन के साप कही इन से महफ...

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दर्द दिल दर्द आशना जाने - बहादुर शाह ज़फ़र
दर्द दिल दर्द आशना जाने - बहादुर शाह ज़फ़र

दर्द दिल दर्द आशना जाने और बेदर्द कोई क्या जाने जुल्फ तेरी है वह बला काफ़िर पूछ मुझसे तेरी बला जाने बेवफा जाने क्या वफ़ा मेरी बावफा हो...

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क्यों जल गया न, ताबे-रूखे-यार देखकर-मिर्ज़ा ग़ालिब
क्यों जल गया न, ताबे-रूखे-यार देखकर-मिर्ज़ा ग़ालिब

क्यों जल गया न, ताबे-रूखे-यार देखकर जलता हू अपनी ताकते-दीदार देखकर साबित हुआ है गर्दने-मीना पे खूने-खल्क लरजे है मौजे-मय तेरी रफ़्तार दे...

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तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है - जाँ निसार अख्तर
तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है - जाँ निसार अख्तर

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब ल...

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नज़र-नवाज़ नजारा बदल न जाए कही - दुष्यंत कुमार
नज़र-नवाज़ नजारा बदल न जाए कही - दुष्यंत कुमार

नज़र-नवाज़ नजारा बदल न जाए कही जरा-सी बात है मुह से निकल न जाए कही वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है मेरे बयान को बंदिश न लग जाये कही ...

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दयार-ए-दिल की रात में -नासिर काज़मी
दयार-ए-दिल की रात में -नासिर काज़मी

दयार-ए-दिल की रात में चिराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक़्ल तो दिखा गया जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये तुझे भी नींद...

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दायरा- कैफी आज़मी
दायरा- कैफी आज़मी

रोज बढ़ता हू जहा से आगे फिर वही लौट के आ जाता हू बारहा तोड़ चुका हू जिनको उन्ही दीवारों से टकराता हू रोज बसते है कई शहर नए रोज धरती मे...

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ग़ालिब - निदा फ़ाज़ली
ग़ालिब - निदा फ़ाज़ली

निदा फ़ाज़ली के बारे में जितना कहा जाये उतना कम है | आप एक मशहूर शायर और लेखक है, आपने कई शायरों पर लेख लिखे है जिनमे से ग़ालिब पर लिखा यह...

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वो बेहद मेहरबा कमरा- जावेद अख्तर
वो बेहद मेहरबा कमरा- जावेद अख्तर

मै जब भी जिंदगी की चिलचिलाती धुप में तपकर मै जब भी दूसरों के और अपने झूट से थककर मै सबसे लड़ के खुद से हार के जब भी उस एक कमरे में जाता था ...

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ग़ालिब के खत -5
ग़ालिब के खत -5

28 मार्च सन् 1853 ई. भाई, आज मुझको बड़ी तशवीश है। और यह खत मैं तुमको कमाल सरासीमगी में लिखता हूँ। जिस दिन मेरा ख़त पहुँचे, अगर वक्त डाक का ...

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खुदा ने दिल बनाकर क्या अनोखी शय बनाई है
खुदा ने दिल बनाकर क्या अनोखी शय बनाई है

खुदा ने दिल बनाकर क्या अनोखी शय बनाई है ज़रा सा दिल है, इस दिल में मगर सारी खुदाई है ये दिल अल्लाह का घर है, ये दिल भगवान का घर है बदी दि...

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अंदाज हू-ब-हू  - अहमद नदीम कासमी
अंदाज हू-ब-हू - अहमद नदीम कासमी

अंदाज हू-ब-हू तेरी आवाजे-पा का था देखा निकलके घर से तो झोका हवा का था उस हुस्ने-इत्तिफाक पे लूटकर भी शाद हू तेरी रजा जो थी, वो तकाज़ा वफ़...

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हम देखेंगे – फैज़ अहमद फैज़
हम देखेंगे – फैज़ अहमद फैज़

हम देखेंगे यह नज्म फैज़ अहमद फैज़ की अन्य नज्मो में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है और यह नज्म पाकिस्तान में इक़बाल बानो ने अपने पुरे शबाब पर गाई...

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वो खुद को सजाये नहीं रख सका
वो खुद को सजाये नहीं रख सका

मेरी बेखुदी का तसलसुल बनाये नहीं रख सका ज्यादा दिनों तक वो खुद को सजाये नहीं रख सका मै खोया तो इसमें ज्यादा खता भी उसी की ही थी वही भीड़ में ...

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नक़्शे-कदम देखते है
नक़्शे-कदम देखते है

जहा तेरा नक़्शे-कदम देखते है खियाबां-खियाबां इरम देखते है दिल आशुफ्तगा खालें-कुंजे-दहन के सुवैदा मै सैरे-अदम देखते है तेरे सरू कामत से एक कद्...

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परिचय-फैज़ अहमद फैज़
परिचय-फैज़ अहमद फैज़

फैज़ अहमद फैज़ के बारे में क्या बताया जाये और क्या ना बताया जाए यह तय कर पाना काफी मुश्किल है | फिर भी यह शुरुवात की जाए | 13 फ़रवरी, 1911 क...

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रोने से और इश्क में बेबाक हो गये
रोने से और इश्क में बेबाक हो गये

रोने से और इश्क में बेबाक हो गये धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गये सर्फे-बहा-ए-मय हुए आलाते-मयकशी थे ये ही दो हिसाब, यो यूँ पाक हो गये रुसवा-ए-...

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अब तो घबरा के ये कहते है कि मर जायेंगे - शेख इब्राहीम ‘जौक’
अब तो घबरा के ये कहते है कि मर जायेंगे - शेख इब्राहीम ‘जौक’

आपने अगर ग़ालिब के बारे में पढ़ा है तो यह जरूर सुना होगा कि  एक बार जौक के एक शेर कहने पर ग़ालिब उछल पड़े थे, लीजिए शेख इब्राहीम जौक़ का वही ...

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कोई ये कैसे बताये के वो तन्हा क्यों है
कोई ये कैसे बताये के वो तन्हा क्यों है

कोई ये कैसे बताये के वो तन्हा क्यों है वो अपना था, वही और किसी का क्यों है यही दुनिया है तो फिर, ऐसी ये दुनिया क्यों है यही होता है तो, ...

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आपकी याद आती रही - मखदूम, फैज़
आपकी याद आती रही - मखदूम, फैज़

आप लोगो ने गमन फिल्म तो देखी ही होगी जो कि सन 1978 में आई थी | इसका एक गीत सीने में जलन जो की शहरयार साहब का लिखा हुआ है भी काफी मशहूर हुआ ...

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ग़ालिब के खत -4
ग़ालिब के खत -4

परसों तुम्हारा ख़त आया। हाल जो मालूम था, वह फिर मालूम हुआ। ग़ज़लें देख रहा था। आज शाम को देखना तमाम हुआ था। ग़ज़लों को रख दिया था। चाहता था ...

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मै पत्थर हू, पिघलना चाहता हू-जाज़िब कुरैशी
मै पत्थर हू, पिघलना चाहता हू-जाज़िब कुरैशी

तेरी खुशबु में जलना चाहता हू मै पत्थर हू, पिघलना चाहता हू उजालो ने दिए है जख्म ऐसे कि जिस्मो-जा बदलना चाहता हू मै अपनी प्यास का सहरा ...

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मुझ से पहली सी मोहब्बत - फैज़ अहमद फैज़
मुझ से पहली सी मोहब्बत - फैज़ अहमद फैज़

फैज़ अहमद फैज़ का यह वर्ष (2011) जन्म शताब्दी वर्ष है आपको जल्द ही फैज़ पर और उनके जीवन पर आधारित लेख पढ़ने को मिलेंगे फिलहाल फैज़ साहब कि यह नज...

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आप को देख कर देखता रह गया
आप को देख कर देखता रह गया

आप को देख कर देखता रह गया क्या कहुँ और कहने को क्या रह गया आते आते मेरा नाम सा रह गया उसके होठों पे कुछ कांपता रह गया वो मेरे सामने ही गया औ...

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ग़ालिब के खत -3
ग़ालिब के खत -3

जनवरी सन् 1856 ई. असदुल्ला क्यों महाराज? कोल में आना और मुंशी नबी बख्श साहिब के साथ ग़ज़ल ख़ानी करनी और हमको याद न लाना। मुझसे पूछो कि मै...

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इश्क ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
इश्क ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

गैर ले महफ़िल में बोसे तेरे नाम के हम रहे यु तशनालब पैगाम के खस्तगी का तुझसे क्या शिकवा कि ये हथकंडे है चर्खे-नीली फाम के खत लिखेंगे, ...

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मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2
मेरे मेहमान - मजाज़ लखनवी -2

इसकी पिछली कड़ी आप यहाँ पढ़ सकते है | जो लोग मजाज को उसकी बेरोजगारी के लिए निशाना बनाते है, वो नहीं जानते की इस बेरोजगारी के पीछे उसकी ...

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मेरा मेहमान मजाज़
मेरा मेहमान मजाज़

यादे याद रह जाती है और यही हमें कुछ वक्त के बाद सताती है, रुलाती है और चेहरे पर मुस्कराहट का कारण भी बन जाती है कुछ इसी तरह की यादे जाँनि...

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