0

लाजिम था की देखो मेरा रस्ता कोई दिन और |

तन्हा गये क्यों अब रहो तन्हा कोई दिन और ||

मिट जाएगा सर गर तेरा पत्थर न घिसेगा |

हू दर पे तेरे नासियाफरसा कोई दिन और ||

आए हो कल और आज ही कहते हो की जाऊ |

मन की हमेशा नहीं अच्छा, कोई दिन और ||

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे |

क्या खूब ! क़यामत का है गोया कोई दिन और ||

हां ए फलक-ए-पीर, जवा था अभी आरिफ |

क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और ||

तुम माहे-शबे-चारदहम थे मेरे घर के |

फिर क्यों न रहा घर का वो नक्शा कोई दिन और ||

तुम कौन से थे ऐसे खरे दाद-ओ-सीतद के |

करता मलकुल्मौत तकाजा कोई दिन और ||

मुझसे तुम्हे नफ़रत सही, नय्यार से लड़ाई |

बच्चो का भी देखा न तमाशा कोई दिन और ||

गुजरी न बहरहाल या मुद्दत ख़ुशी-नाखुश |

करना था जवांमर्ग! गुजरा कोई दिन और ||

नादां हो जो कहते हो की क्यों जीते हो 'ग़ालिब' |

किस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और ||

मायने
पत्थर= यहाँ पत्थर कब्र के पत्थर को कहा गया है, नासियाफरसा= माथा रगड़ रहा हू, माहे-शबे-चारदहम= पूर्णिमा का चाँद, मलकुल्मौत= मौत का देवता, दाद-ओ-सीतद= जीवन के खातो के
मिर्ज़ा ग़ालिब के लेखो से खुद को अपडेट रखने के लिए क्या आपने ब्लॉग को सब्सक्राइब किया अगर नहीं तो इसे फीड या ई-मेल के जरिये सब्सक्राइब कीजिये |

Post a Comment Blogger

 
Top