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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूं कितना है
नौके-खजर ही बताएगी कि खूँ कितना है

आंधिया आयी तो सब लोगो को मालूम हुआ
परचमे-ख्वाब ज़माने में नगूं कितना है

जमआ करते रहे जो अपने को जर्रा-जर्रा
वो क्या जाने बिखरने में सकूँ कितना है

वो जो प्यासे थे समंदर से भी प्यासे लौटे
उनसे पूछो कि सराबो में फुसू कितना है

एक ही मिटटी से हम दोनों बने है लेकिन
तुझमे और मुझमे मगर फासला यूं इतना है
                                                  -शहरयार    
मायने
नगूं=झुका हुआ, सराबो=मृगमरीचिकाओ, फुसू=जादू
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