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लज्जते-आगाज ही को जाविदा समझा था में
ए मोहब्बत तेरी तल्खी को कहा समझा था में

शौला-ए-गुल बेहयात व बर्के-खातिर बे सबात
किन संधेरो को चिरागे-आशियाँ समझा था में

अब खुला मुझ पर की है ईमा-ए-तामिरे-जदीद
बिजलिया जिनको हरीफ़े-आशियाँ समझा था में

शह्जन से भी हू नालां राहबर का जिक्र किया
कोई जज्बा कारवां-दर-कारवां समझा था में

गौर से देखा तो गुमराही का एक सैलाब था
जिस हुजुमे-हक़-निगर को कारवां समझा था में
                                                        - साग़र निज़ामी

मायने 

लज्जते-आगाज=शुरुआत का आनंद, जाविदां=अमर, शौला-ए-गुल=शौले की तरह सुर्ख फुल, हयात=जिसमे जीवन न हो, बर्के-खातिर=दिल में छिपी बिजली, बे-सबात=मिट जाने वाला, चिरागे-आशियाँ=घर का चिराग, ईमाँ-ए-तमिरे-जदीद=नवनिर्माण की वजह, हरीफ़े-आशियाँ=घरोंदे की दुश्मन, राहजन=लुटेरा, राहबर=मार्गदर्शक, कारवा-दर-कारवां=सब तरफ छाया हुआ, गुमराहो=भटके हुए, हुजुमे-हक़-निगर=सत्य पर चलने वाला दल
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