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तोड़ सभी तटबंध गाव के उमड़ चली नदिया इस साल
फसल, खेत, खलिहान, गाव को रोंद चली नदिया इस साल
अपने सौतो का मीठा जल जिन्हें पिलाकर पाला था
पैर उन्ही कि छाती पर धर रोंद चली नदिया इस साल
दीं और दुर्बल कि ताकत का सबको अंदाज हुआ
विषधर-सी फुफकार उठी जब केचुली सी नदिया इस साल
जिस तट भीड़ लगी रहती थी लोगो कि हर शाम-सुबह
छोड़ गई अवशेष चिताओ के उस नदिया इस साल
ठेकेदारों-नेताओ के चेहरों पर कुछ खास चमक
उभर आई जब से चर्चा का विषय बनी नदिया इस साल
गली-गली खामौशी घर-घर गहन उदासी का आलम
हसी-ख़ुशी वीरान कर गई पल भर में नदिया इस साल
                                                             - हीरालाल नागर
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