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हवा गरम, फिजा गरम, दायर भी गरम-गरम
मै पी रहा हू चाय सी ये जिन्दगी गरम-गरम
ग़मों कि सर्द रोटियों के साथ चाय कि तरह 
तू कम से कम परोस दे मुझे हसी गरम-गरम
था देखने में यु तो सर्द शबनमी-बदन मगर
मै छुने जब गया उसे वो आग थी गरम-गरम
वह गुल सुलगती धुप से कुछ इस तरह है आशना
कि चाहता है रात को भी चांदनी गरम-गरम
                                                     - रंजित भट्टाचार्य

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