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हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल, क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ू जजों चश्मे-तर से उम्र भर यु दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते है जिस काफ़िर पे दम निकले

खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा वाइज़
कही ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहा मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहा वाइज़
पर इतना जानते है कल वो जाता था कि हम निकले
                                                                 - ग़ालिब
 मायने-
चश्मे-तर से =सजल नेत्रों से,  खुल्द=स्वर्ग, आदम=आदिमानव, वाइज़=उपदेशक, काफ़िर सनम=बुत






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