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सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यू है 
इस शहर में हर शख्श परेशां सा क्यू है 

दिल है तो धडकने का बहाना कोई ढूंढे 
पत्थर की तरह बेहिस-बेजान सा क्यू है 

तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफ़िक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यू है 

हम ने तो कोई बात निकली नहीं ग़म की 
वो जूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यू है 

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में 
आईना हमें देख के हैरान सा क्यू है 
                                        - शहरयार 
शहरयार साहब क़ो ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की हार्दिक बधाई 
यह ग़ज़ल भी फिल्म गमन में ली गई है पेश है सुनिए

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  1. हाँ, हमने भी ज्ञानपीठ की खबर सुनी. ये उनकी ग़ज़ल है, ये नहीं मालूम था..
    अच्छा संकलन, जारी रखिये ...

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  2. बहुत ही खूबसूरत शब्‍द, अनुपम अभिव्‍यक्ति ।

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  3. दिल खुश करने वाली पोस्ट। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    फ़ुरसत में ….बड़ा छछलोल बाड़ऽ नऽ, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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  4. Jakhira signifies its name.Excellent collection of poems.Keep it going

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  5. @puneetजी धन्यवाद, आप लोगो का सहयोग ही इस जखीरे को बढ़ाने मव मदद करता है |

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