5

सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यू है 
इस शहर में हर शख्श परेशां सा क्यू है 

दिल है तो धडकने का बहाना कोई ढूंढे 
पत्थर की तरह बेहिस-बेजान सा क्यू है 

तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफ़िक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यू है 

हम ने तो कोई बात निकली नहीं ग़म की 
वो जूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यू है 

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में 
आईना हमें देख के हैरान सा क्यू है 
                                        - शहरयार 
शहरयार साहब क़ो ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की हार्दिक बधाई 
यह ग़ज़ल भी फिल्म गमन में ली गई है पेश है सुनिए
video

Post a Comment

  1. हाँ, हमने भी ज्ञानपीठ की खबर सुनी. ये उनकी ग़ज़ल है, ये नहीं मालूम था..
    अच्छा संकलन, जारी रखिये ...

    ReplyDelete
  2. बहुत ही खूबसूरत शब्‍द, अनुपम अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  3. दिल खुश करने वाली पोस्ट। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    फ़ुरसत में ….बड़ा छछलोल बाड़ऽ नऽ, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

    ReplyDelete
  4. Jakhira signifies its name.Excellent collection of poems.Keep it going

    ReplyDelete
  5. @puneetजी धन्यवाद, आप लोगो का सहयोग ही इस जखीरे को बढ़ाने मव मदद करता है |

    ReplyDelete

 
Top