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अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए !
जिसकी खुशबू से महक जाये पडोसी का भी घर,
फुल इस किस्म का हर सिम्त खिलाया जाए !
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी,
कोई बताए कहा जाके नहाया जाए ! 
प्यार का खून हुआ क्यों ये समझने के लिए,
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए !
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर ऐसा,
मै रहू भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए !
जिस्म दो होके भी दिल एक हो अपने ऐसे,
मेरा आसू तेरी पलकों से उठाया जाए !
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी,
ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए !
                             - गोपालदास 'नीरज'

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  1. बढ़िया संकलन , जारी रखिये ...

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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