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जाने किस वक्त कि रहगुज़र पे तू
ये शिकस्ता जिस्म और दस्ते तन्हाई
बैठा हू सांस रोके पीटने
हेरता हू घायल चाँद को मै

झरते है कुछ बेतासीर लफ्ज बस
कभी कोई आहट
कभी सरगोशी
और एक पर्ची जो चीख-चीख जाती है

रात के इस बेकिनार सेहरा में
नक्श धुंधले है रास्तो के सभी
जमीं महवर से हट रही जैसे
चिराग आँखों के इस कदर मद्धिम
कि हरेक लम्हा पकड़ से बाहर

कितना है फासला और कितना सफ़र
ये तेरा जिस्म तातवा है और मै हू
                                    - लीलाधर मंडलोई

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