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मोहब्बत में तुम्हे आंसू बहाना नहीं आया,
बनारस में रहे और पान खाना नहीं आया !

न जाने लोग कैसे है मोम कर देते है पत्थर को,
हमें तो आप को भी गुदगुदाना नहीं आया!

शिकारी कुछ भी हो इतना सितम अच्छा नहीं होता,
अभी तो चोंच में चिड़िया के दाना तक नहीं आया !

ये कैसे रास्ते से लेके तुम मुझको चले आए,
कहा का मैकदा इक चायखाना तक नहीं आया ! - मुनव्वर राना

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  1. नाम तो काफी बार सुना था, पढ़ा आज पहली बार, ये तो बड़ा कमबख्त किस्म का लिखते है ... लाजवाब .. !

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  2. आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

    आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

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