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वो जो हम में तुम में करार था तुम्हे याद हो के न याद हो,
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हे याद हो के न याद हो !

वो नए गिले वो शिकायते वो मजे-मजे कि हिकायते,
वो हर बार एक बात पे रूठना तुम्हे याद हो के न याद हो !

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी,
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हे याद हो के न याद हो !

सुनो जिक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का,
वो निबाहने का तो जिक्र क्या, तुम्हे याद हो कें याद हो !

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम में तुम से भी राह थी,
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हे याद हो के न याद हो !

हुए इत्तफाक से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम,
गिला-ए-मलामत-ए-अर्कबा, तुम्हे याद हो के न याद हो !

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर, वो करम के था मेरे हाल पर,
मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा, तुम्हे याद हो के न याद हो !

कभी बैठे सब में जो रु-ब-रु तो इशारतो ही से गुफ्तगू,
वो बयान शौक का बरमला तुम्हे याद हो के न याद हो !

किया बात मै ने वो कोठे कि, मेरे दिल से साफ उतर गई,
तो कहा के जाने मेरी बला, तुम्हे याद हो के न याद हो !

वो बिगड़ना वस्ल कि रात का, वो मन्ना किसी बात का,
वो नहीं-नहीं कि हर आन अदा, तुम्हे याद हो के न याद हो !

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफा,
मै वही हू "मौमिन"-ए-मुब्तला तुम्हे याद हो के याद हो !
                                                           - मौमिन खाँ मौमिन

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