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अब बुलाऊ भी तुम्हे तो तुम न आना !
टूट जाए शीघ्र जिससे आस मेरी
छुट जाए शीघ्र जिससे सास मेरी,
इसलिए यदि तुम कभी आओ इधर तो,
द्वार तक आकर हमारे लौट जाना !
अब बुलाऊ भी तुम्हे ...!

देख लू मै भी की तुम कितने निष्ठुर हो,
किस कदर इन आंसुओ से बेखबर हो,
इसलिए जब सामने आकर तुम्हारे,
मै बहु अश्रु तो तुम मुस्कुराना !
अब बुलाऊ भी तुम्हे .... !!

जान लू मै भी कि तुम कैसे शिकारी,
चोट कैसी तीर कि होती तुम्हारी,
इसलिए घायल ह्रदय लेकर खड़ा हू
लों लगाओ साधकर अपना निशाना !
अब बुलाऊ भी तुम्हे...!!

एक अरमान रह जाए न मन में,
औ, न बचे एक आंसू नयन में,
इसलिए जब मै मरू तब तुम घृणा से,
एक ठोकर लाश से मेरी लगाना !
अब बुलाऊ भी तुम्हे .....!!
                                 -गोपालदास नीरज

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