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हजरत अल्लामा सर शेख मोहम्मद "इक़बाल 09, नवम्बर, 1877 ई. को सियालकोट में पैदा हुए. वह कश्मीरी ब्राम्हण थे. उनके पूर्वज कश्मीर से पंजाब आये थे उनके पिता एक अच्छे सूफी संत थे. उनकी माता ने उनका नाम "मोहम्मद इक़बाल" रखा था | घर पर प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ समय तक आपने 'मकतब' में पढ़ा, फिर स्कूल में प्रवेश लिया |
आप स्काच मिशन कॉलेज स्यालकोट से F.A. पास करके लाहौर आये | 1892 में B. A. और 1899 में M. A. पास किया | इकबाल को प्रारंभ से ही शिक्षा, ज्ञान प्राप्त करने का शौक था अथ आप 1905 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड गए | Cambridge विश्वविद्यालय (जर्मनी) से फिलासफी ऑफ़ इरान पर एक उच्च श्रेणी का लेख लिखकर P.H. D. की डिग्री प्राप्त की और फिर बेरिस्त्री की परीक्षा भी पास की |
विलायत से वापस आने के पश्चात् आपने कुछ समय प्रोफेसरी करके नौकरी से मुक्ति प्राप्त कर बेरिस्टरी शुरू की | 1926 से आप ने राजनीति में भाग लेना शुरू किया, 1931 व 1932 में दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कान्फरेंस में भाग लेने के लिए इंग्लॅण्ड की यात्रा की | 1922 में आपको 'सर' की उपाधि से सम्मानित किया गया |
1855 से पूरब के सबसे बड़े शायर और फलसफी इकबाल की रचनाओ के चर्चे भारत के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ो और समुद्रो से गुजर कर इंग्लॅण्ड, जर्मनी और इरान के साहित्यिक वर्गो में पहुचने लगे थे | इकबाल ने भारत की आज़ादी और क्रन्तिकारी भावनाओ को भी अपनी कविताओ का एक अंग बना लिया था |
अल्लामा 'इक़बाल ने जिन स्त्रोतों से लाभ उठाया है उन में सबसे पहला नाम मौलाना 'रूमी' का है | 'ग़ालिब और जर्मन शायर 'गोयटे' ने भी इक़बाल को बहुत प्रभावित किया है. उनकी प्राम्भिक रचनाओ में प्रेम और बुद्धि का प्रयोग अधिकता से हुआ है. अल्लामा 'इक़बाल' बहुत खूब व्यक्ति थे कोमलता, सहनशीलता, फकीर दोस्ती और भलाई की भावना उनमे बहुत थी. वे एक रहम दिल और अमन पसंद व्यक्ति थे | उर्दू फारसी के इस प्रसिद्ध फलसफी शायर की मृत्यु 60 वर्ष की आयु में  21 अप्रेल, १९३८ को हुई और बादशाही मस्जिद लाहौर के बराबर में दफ़न हुए |

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